जिंदगी को, बेचकर वह
पृष्ठभूमि: आजकल ज्यादातर लोग कल की चाहत में आज भी नहीं जी रहे, महत्वाकांक्षा हमें सांस नहीं लेने देती, जीवन में चैन नहीं रहा और जब हम सब आज को गंवा कर जब उस चकाचौंध को पाते हैं तो उसे इंजॉय नहीं कर पाते उसके रख रखाव और उसे बनाए रखने की चिंता में ही रह जाते हैं या हम ही उसके लिए आउटडेट हो चुके होते हैं। सभी की लगभग यही कहानी है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और मजे लें। सुधर पाएं तो आप को मेरी शुभकामनाएं।
जिंदगी को, बेचकर वह
जिंदगी भर,
यत्न... से
सामां... खरीदा,
जिंदगी-का..
खुश हुआ,
तब!
एक क्षण! सब देखकर!
संतोष से, वह बैठकर!
मुस्कुराया..., और बोला
सामां, प्रचुर है!
इस, जिंदगी भर के लिए..।
लेकिन, अचानक क्या हुआ
वह, थोड़ा, संजीदा हुआ,
देखता है मिरर में...
बाल.. सारे पक.. गए हैं
मन.. भी है, रीता.. हुआ।
उम्र से, वह थक.. चुका है
इन रुपयों... का क्या करे।
जिंदगी कितनी बची है,
सोच में वह पड़ गया..
पर-जिंदगी-तो, भर-चुकी-थी
बस एक ही दिन, उससे-पहले।
ये तो बस एक ख्वाब था
मैने सुनाया आप को।
छोड़, सब संसार में,
उसने विदा ली, प्यार से
इसलिए मैं कह रहा हूं,
जिंदगी कुछ है नहीं ...
जिंदगी है रास्ता...,
ठीक से, हर रोज,
तुम....इस पर चलो
थोड़ा मुस्कुराओ और, थोड़ा तुम हंसो
बस प्यार.... से, इसको... जिओ।
जय प्रकाश मिश्र
मर्म: आज अच्छा तो कल भी अच्छा ही होगा, कल की चाहत में आज कुछ भी उल्टा सीधा न करें, हर रोज आखिरी दिन है जीवन का, मानकर यथेष्ठ जीवन जिएं ।
जिंदगी को छू, के देखा,
जिंदगी को.. जी, के देखा,
जिंदगी को पा..., के देखा,
जिंदगी को चख....के देखा,
एक खाली.. बुलबुला...!
चमकती थी, बहुत सुंदर,
रसभरी सी।
पर! सच कहूं... मानोगे मेरी!
ये जिंदगी, वास्तव में,
कुछ, थी ही...?
नहीं।
बस ढकोसला थी,
वृहद नाटक ही, तो थी,
जिसे खेलना था,
उम्र भर,
साथ सबके जूझना था,
संग मिलकर..।
खींचती थी मुझे अंदर
किर्चियां ले, पर्चियां बन
निकलती थी, रोज यह,
घटित होती,
परछाइयों के उदर में,
चांद सूरज संग, सारी प्रकृति में ।
क्रमशः आगे..
जय प्रकाश मिश्र
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