क्या, इसलिए ही प्रेम बसता है हृदय के, कोटरों में

भाव: सोचता हूं आखिर! इन रंगों में क्या है? क्यों ये सभी के मनों को ऐसे मोह लेते हैं। क्या रिश्ता है अपना इनसे? पता चला की जीवन की शुरुआत ही रम्य रंगीले पुष्प से होती है, पुष्प का रंग, इसका सौंदर्य प्रकृति चक्र को सतत बनाए रखने के लिए ही इतना आकर्षक बना है। इस प्रकार रंग और सौंदर्य वह मौन शक्ति हैं जो परमात्मा की सृष्टि को अनवरत चलाने की सामर्थ्य रखते हैं। इनकी शक्ति से ही परागण स्वतः स्फूर्त प्रेम के वशीभूत हो चलता रहता है। और प्रेम का मूल तत्व इस संसृति में आत्मित हो स्वभाव में आत्मर्पित होता रहता है। जीवन में हर ओर माधुर्य ही संव्याप्त रहे तो अच्छा है, इस पर कुछ आड़ी तिरछी लाइने पढ़ें। आनंद लें।


आकर्षण… 

सदा से कृष्ण.. में है, श्याम.. में है,

बुलावा यहीं.., ठहराव.. है, 

जोड़.. है, योग है, प्रेम है

घनश्यामता… भी,  

यहीं है।

ये… उजाले! 

प्रतिकर्षण.. सदा हैं, 

वापसी हैं, परावर्तन हैं.. पक्के।

मिलन हैं, क्षण.. मात्र के, 

योग तो संभव नहीं है, साथ इनके। 


क्या,

इसलिए ही

प्रेम…. बसता है हृदय के, कोटरों में, 

कालिमा की श्यामता में, घुप अंधेरे, 

दूर सारे उजालों से, मौन में, शांति में, 

माधुर्य में, 

चुप

पनपता, रचता, है बढ़ता  

सरसता, विश्राम पाता, है, हृदय में।

ज्ञान के प्रकाश में 

क्या?  प्रेम, जड़ से, झुलसता है।

उजालों और अंधेरों संग 

प्रेम का यह खेल क्या है? 


रंग क्या हैं? 

रंग भी तो, श्यामता का, अंग ही हैं।

बढ़ता हुए, क्रमशः घनेरा 

और आगे कम से ज्यादा, 

गाढ़े से गाढा और फिर काले से काला

कृष्ण ही हैं।


सोखते हैं परावर्तन,

संजोते हैं, किरण हृद-वन।

गुलाबी से लाल होते, 

लाल से रक्तिम हैं बनते,

सूखने पर और आगे

कृष्ण होते, श्याम बनते, 

पल छिन! बदलते, पल छिन! बदलते।

आखिरी मंजिल सभी की

 कृष्ण ही हैं, और कृष्णता है।

कुछ इस तरह, यह विश्व सारा!  

है समाया.. कृष्ण में! 

और कृष्ण हैं फैले हुए, 

हर रंग में, हर एक में, हर वस्तु में।


सोचता हूं! 

हर रंग… में, यदि कृष्ण… हैं,

तो.. 

रंग में… 

कुछ दम भी होगा…

क्या इसलिए ही, इतने सारे 

पुष्प ने, 

एक साथ मिलकर, 

इतने अलग, 

प्रिय....,सुखद, सुंदर..

श्रीकृष्ण रूपी रंग को भी चुना होगा।


अलहिदा हों, रंग सबके 

पर सांवरे, सुंदर, सलोने, ये पुष्प... हैं,

तृप्ति के अद्भुत खिलौने पुष्प हैं। 

ये पुष्प हैं, श्री रूप, यह मै मानता हूँ 

क्या इसलिए ही कृष्ण रूपी रंग में 

मानव का मन 

कुछ इस तरह से रीझता, 

बंधता 

हृदय तक भीगता, माधव चरन रस

पान करता विहरता है।

जय प्रकाश मिश्र

स्वरचित मूल रचना 


Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!