मुझे, इसका कोई हल तो, दे दे।

भाव:आदमी एक भावना प्रधान प्राणी है। कभी कभी अपनो के क्रूर आघात इसे अंदर से इतना विचलित कर देते हैं, कि यह भीतर से टूट जाता है और फिर वापस उस मूल प्यार और विश्वास की स्वाभाविक लय-ताल में कभी लौट नहीं पाता। इस लिए हमेशा अपने प्रिय और आसपास के लोगों से सलीके से, संयम से पेश आना चाहिए, इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

जिंदगी की 

पहली इबारत… ही 

मिटा दी,

तूने मेरी…. कुछ ऐसे, 

आगे.. मैं,कुछ और

लिखने के, काबिल न बचा। 


फूल से, 

कलियों से, 

उनसे भी आगे बढ़कर, 

खुशबू भरे.. 

कुछ अरमान.. 

सजा रखे थे, मैने, 

जाने कबसे, तेरी कसम,

तेरे लिए, अक्षर नहीं थे, 

वे, अहसास थे, मेरे।

उन्हें खोलूं, दिखाऊं,तुम्हें

तुमने मौका, न दिया। 


उकेरे थे, बड़े प्यार से, 

संजीदगी से मैने, 

उस कागज के दिल पे, 

रंगीन तितली बन, बैठ…

मन के, फूलों पे।


कुछ शब्द चुन रखे थे, 

केवल, तेरे लिए 

पर वे

कलम से आगे, फिर कभी, 

आज तक, 

निकल… ही न सके।


तेरी शक-ए-निगाह… ने 

मेरा कागज… ही वो, 

जला डाला

जिन पर 

अरमानों के फूल… 

खिलने… थे, कभी मेरे। 


छुपा के रखी थी 

कुछ बातें

सभी से

दिल के कोने में, 

कभी खुश हो के, 

मिलोगे, 

तो 

तुम्हें सुनाऊंगी..

तेरी इस एक हरकत ने, 

उन्हें कुछ ऐसे, 

मसल डाला

अब ये जिंदा लाश ले के 

इस तरह!  

मैं जाऊं कहां?  

मुझे,इसका 

कोई हल तो, दे दे।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: किसी के दुर्व्यवहार का नतीजा किसी के लिए विकट परिस्थिति पैदा कर उसे तनावग्रस्त कर अवसाद में धकेल देता है और वह एक निरीह प्राणी मात्र बचता है। इसलिए हमेशा अपनों में अपना व्यवहार सलीके से अच्छा रखें। क्यों कि उसकी भी कीमत आप ही चुकाएंगे।



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