दर्प था मुझमें, नियंता मैं हि हूँ, इस सृष्टि का।

भाव: इस संसार में हमेशा जिस समय कोई घटना होती है उससे, अपने इंद्रियों की क्षमता और सूचना तंत्र के चलते हम थोड़ा पीछे रहते हैं। एक बैकलॉग जुड़ा हुआ है, वास्तव समय और हमारे  संज्ञान लेने के बीच में समय का। आंखे बेशक साथ जुड़ी हों घटनाओं से, देखती हो पर प्रकाश की गति सीमा के चलते बाद में देखती हैं और उससे हमारे संज्ञान में आने में थोड़ा समय बीत जाता है। प्रतिक्रिया या बचाव स्वतः हो चुका होता है इस बीच, उस पर, हमारा अवचेतन मस्तिष्क कार्य कर चुका होता है बिना हमारी बुद्धि और विवेक के ही।  हम राजा की तरह हैं हमारी सेनाएं लड़ाई लड़ कर हार जीत की सूचना मात्र हमे देती हैं और हम खुश होते हैं या पछताते हैं। इन्हीं पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

फूल बन कर 

खिल चुकी जब, कली वह

उस बाग में.., महकती

तब उसे, 

खिलती कली देखा था मैने, 

खुश हुआ था, आप में।

एक सच कहूं, 

यह, मेरी नहीं, सबकी.. नियति है! 

आज भी है! आगे रहेगी।


मैं लेट था, जिंदगी भर, 

समय से, वर्तमान से, 

घटनाक्रमों से

बुद्धि से विवेक से हर साधनों से।

पर दर्प था.. 

मुझमें, 

नियंता मैं हि हूँ, इस सृष्टि का।

यह बिल्कुल गलत था, 

मै मूर्ख था, 

सत्य से अंजान था

अभिमान था, मेरा ये झूठा।


मैं आदमी.. था, 

पर यंत्र.. था, 

नस नाड़ियों.. का, इसलिए 

वास्तव की 

वास्तविकता से परे था.. जिंदगी भर।

सूचना का तंत्र, थोड़ा समय लेगा

बदलने में बिंब को

आवाज को, छुअन को 

पकड़ने में, भेजने में, सोचने में, 

प्रतिक्रिया, रिस्पांस में।

इसलिए मैं कह रहा हूं

आज तक, 

जो घट रहा था, 

जिस समय, उस समय

मैं, आगे..... नहीं, 

पीछे खड़ा था।


कुछ इस तरह

अतीत में, उलझा पड़ा था, 

इसलिए मैं, रोक पाया ही नहीं, 

घटनाक्रमों को

जिन दोष में लिपटा रहा,

मै जिंदगी भर। 

यह मानकर!  

वर्तमान से मैं लड़ रहा हूँ, शिद्दत से पूरी,

सब गलत था, मै मूर्ख था।


रोक पाता मैं तुम्हें, 

हर बुरे, उस काम से जो गलत था,

पलक पहले

उस धार पर, यदि खड़ा होता..! 

पर मैं कहां था, 

बीच में मध्यस्थ था एक, 

जो बताता था मुझे बस

क्या हो चुका है।


इस धारणा 

और वास्तविकता के बीच में

कुछ क्षणों तक निर्णयों की तलाश में

अवचेतन मेरा मेरे साथ था 

मित्र... सा

निर्णय.. लिया, 

जब जहां जैसा हुआ था।

पर, तब मैं नहीं था।


एक धारणा ले जी रहा हूँ 

विश्व में इस, 

मैं जानता.. हूं!  

बुद्धि... से संयुक्त.. हूँ, 

ज्ञान.. से परिपूर्ण हूँ, सब देखता हूँ

पर मात्र मैं संज्ञान लेता, 

देखता हूं! सत्य का उस जो, 

बीता हुआ है, कुछ काल पहले।


घटना क्रमों में

मैं वहीं बस जानता हूं, 

देखता, संज्ञान लेता

जो जानाता हूँ.. पूर्व से..

शेष सारा दृश्य, पूरा 

छोड़ता हूं,

याद भी उसकी नहीं, कोई मुझे, 

जो घट रहा था दृश्य में।


एक जगह है 

जहां, सब कुछ बदलता है

मर्म में, संज्ञान में,

आवाज सारी, बिंब सारे, 

महक और ये छुअन सारी

वह विंदु ही तो खास है 

हर आदमी में, भृकुटि में।


सूचना पर झपटती हैं 

धारणाएं! वुल्फ सी

अवचेतन तभी, जो सुप्त है

मुंह खोलता है, आप से  (स्वतः)

एक निर्णय.... 

पूर्व... की उन गुत्थियों... से

निकलता.. है, आप.. ही 

कुछ समझ पाऊं, उसके पहले

मुंद रही मेरी आंख सा 

बिना मेरी सूचना... के।

चेतना में विचार बन कर तैरता है।

सिद्ध करता हर कार्य को इस जगत में।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: अनेक परिस्थितियों में  आकस्मिकताओं में हमारा अवचेतन मन मस्तिष्क स्वतः स्फूर्त निर्णय लेकर जो पूर्व से स्मृतियों में जमा है कार्य संपादित कर चुका होता है तब हमे अपने निर्णय की जानकारी यह मस्तिष्क देता है। हमारी बुद्धि विवेक सब आगे के लिए अवचेतन की पृष्ठभूमि की खुराक मात्र ही हैं। 

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