मिट्टी ही था, पर मिट्टी में रौनक समेट देता था।

भाव: जिंदगी में खुश होना, और जिंदगी को अपने ऊपर नहीं, नीचे समझना चाहिए। जीवन की हर अच्छी और बुरी घटनाएं, जीत, हार भावी जीवन की नींव होती हैं। हार हमारे जीवनमार्ग को सही करने का उद्यम या माध्यम होती हैं। कभी भी हार से परेशान न हों यह आपके जीवन को आगे बदल देगी आप स्वयं देखेंगे, इस पर अन्य लोगों से जरूर जाने। आप तब निडर हो अफसोस रहित होकर अपराजेय बने गे। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।

दिन बचे हों, चाहे, जितने, 

जिंदगी के

आज तो खुश हो हि, ले 

मेरे..., यार मुझसे,

मैं... चाहता हूं, आ हंसे... हम, 

साथ... मिलके।

आज तो खुश हो हि, ले 

मेरे..., यार मुझसे।


क्या हुआ,  "कुछ" ना.. मिला

भूल.. जा, उसे भूल.. जा

जिसे मिल गया, 

तूं मिल उसे...,

मुबारकबाद... तो दे...

दिन बचे हों चाहे जितने, जिंदगी के

आज तो खुश हो हि, ले 

मेरे... यार मुझसे।


ये हार!  क्या है? 

रास्ते.... की सीढियां हैं,

चढ़ गया है गर तूं इसपे, 

उतर फिर से,

रास्ता... तेरा और... था 

इसलिए... 

शायद उतारा... है, तुझे

उस रास्ते... से, 

सच मान मेरी, जिंदगी.. ने।

इसलिए मैं कह रहा हूँ, 

मान मेरी, आज तो, 

खुश हो हि ले, मेरे यार मुझसे।


मिलना... मुझे 

तूं फिर.... कभी, बात.. करना 

हार... का इस 

ये... रास्ता थी? , रुकावट... थी?   

मार्ग दर्शक थी तेरी? 

तेरे रास्ते... का, जिंदगी... में

ये हार!  

मेरी मान!  तुझपे..।

इसलिए तो कह रहा हूं

दिन.. बचे हों चाहे जितने, 

जिंदगी के

आज तो खुश हो हि, ले, 

मेरे... यार मुझसे।


"गुजर.. जाएगा सभी कुछ" 

याद रख!  

हंसा देगा भी तुझे, 

वो, याद रख!  

कितना बुरा हो, बुरे से भी बुरा हो, 

तेरे लिए वो आज...

वादा रहा, मेरा सुनो तुम ध्यान दे के

एक दिन, 

खिला देगा, फूल तुझमें...। 

याद रख! 

कहा उसने.., सुना मैने.., 

न ध्यान से

पर आज लगता है कहा...  था

सच....ही उसने।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: मैं और मेरी जिंदगी

भाव: लोग भौतिकता में अंधे हो गए हैं पर जब वाकई जरूरत पड़ेगी तो आदमी ही काम आएगा न कि दुनिया के असबाब। इसपर दो लाइने पढ़ें।

वो भर जिंदगी, दौड़ता... रहा

लिए, सामानों... हयात 

आज देखा, उसे 

रोता तार! तार!, सुबकते हुए, 

पर मान मेरी

एक भी सामां जगह से 

हिले, हि नहीं।


उसने कितने जख्म 

कितनी खरोचें खाई 

बेंच दिया वक्त सारा

जिंदगी गिरवी रखी 

दुनियां पाने के लिए।

आज सारे मालो-असबाब 

लिए बैठे देखा उसको 

न जाने किसका 

इंतजार करता घूरता था

सूनी आंखों में सूखा पानी सा लिए।

पग तीन:  दूसरा पक्ष जीवन का


लेकिन कुछ लोग अलग 

भी होते है  

जिंदगी जीते है, 

सिलते है एक एक पल 

अपना

खुद के लिए नहीं, 

औरों के लिए।


वो सख्श था, 

तन्हाई खरीद लेता था,

जहां भी जाता 

रौनक बिखेर देता था।

भूल जाता था 

हद तक जरूरतें अपनी,

मिट्टी ही था, 

पर मिट्टी में 

रौनक समेट देता था।

जय प्रकाश मिश्र


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