सब एक सा जीते हैं कोई महलों में, कोई नीचे
भाव: सामान्यतः हम ये सोचते हैं अभाव, दुराशा, समस्याएं, परेशानियां, तकलीफें किसी वर्ग विशेष में ही ज्यादा रहती हैं। पर एक सच कहूं हर वर्ग, हर क्लास, हर ग्रुप अर्थात पूरे समाज में हर किसी की जिंदगी, समान मनोभावों से ही बनी है, उन्हीं को चुनती है,अवधारणा करती है, गुजरती है, उन्हीं में बुनी है। आपको देखने में बेशक लगता हो कि वो भाग्यशाली है, सुख से है पर मानव मन कहीं किसी भी लेवल पर रहे उसकी प्रवृत्ति एक ही है समस्याओं को खोजना, और परेशान दुखी रहना। नौकरी वाला, बिना नौकरी वाला, सफल लोग और असफल लोग सब एक ही मनोभाव से गुजरते हैं। बस हमारी अपनी दृष्टि उन्हें अलग मानती है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें आनंद लें।
मत छू
मेरे घावों को
बहने.. दे,
इन्हें, खुद.. से
अब, ये जख्म.. ही,
साथी.. हैं मेरे..
संग इनके.. मुझे रहने दे।
भाव: हारा हमेशा अन्तर्द्वंद में अपने हार की भावना में ही डूबा जीता है। अपने दुर्भाग्य को पहन लेता है बाहर आता ही नहीं। मनःस्थिति से निबरता हि नहीं, अवसाद में डूबा रहता है। और
खाई हैं
कितनी, ठोकर!
जमाने के उसूलों से,
इनाम हैं, ये उस रहमत के
रहमत, उन्हें कहने दे ।
भाव: हारा आदमी जमाने की हर व्यवस्था, इसकी चालढाल, मान्यताएं, शिष्टता से अपने को ठगा महसूस करता है, उलाहना देता है। समाज से उसकी लाखों शिकायतें होती हैं और उन्हें व्यंग में अपने ऊपर उपकार ही कहता है। फिर..
चल,
छोड़ मेरी बातें
तूं अपनी ही सुना, प्यारे!
जिस डाल, थे फल आए,
उसकी, तूं सुना बातें
खुशबू भी क्या बिखरी?
रौनक थी बहारों पर!
कुछ अच्छी सुना बातें,
तूं, छोड़ मुझे, मुझपे।
भाव: वह कुतुहल वश अपने समय के सफलतम लोगों के बारे में जानने को उत्सुक होता है कि उन लोगों की जिंदगी तो बड़े ऐशो आराम से गुजर रही होगी। चलो उनसे ही खुश होते हैं। पर..
रंग भोले हैं, भर आए
बरबस तेरी आंखों में
चेहरा तो तेरा चुप है
सच कहती हैं.. निगाहे ये।
भाव: जिसे जीता समझता था, जो सफल था कहने के लिए वह अपनी जिंदगी को सोचकर उसकी व्यर्थ की उपलब्धि पर रूआंसा हो आंखे भर लेता है। रोने लगता है, यह देखकर…
सब एक सा जीते हैं
कोई महलों में, कोई नीचे
मन एक है, आदत है
वो हारे, हम जीतें।
भाव: हारे और जीते, दोनों समझ जाते हैं कि जीवन में महल और मंडई का अंतर वास्तव में अंतर नहीं। अंतर मन की समझ, और हमारी आदतों से आता है।जहां प्रतिद्वंदता है वहां आनंद नहीं मात्र भाग दौड़ और प्रतिशोध है।
कोई फर्क नहीं यारों
भर जाए तो भर जाए
ये मन है, निगाहों से
या खाली हो तमाशों में।
भाव: असली बात तो मन भर गया तो, इच्छाएं समाप्त तो सुख है आनन्द है और लालच, राग, विषय भोग बचा रहा तो दुर्गति साथ रहेगी। मन तो दृष्टि से देखने मात्र से संतोषी का भर जाता है जबकि लालची सारे तमाशे कर, भोग के बाद भी खाली ही रहता है।
जय प्रकाश मिश्र
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