घर बनाकर! जोड़, जोड़ा परिणयों का

भाव: कभी कभी अपने लोगों के ही बीच मां, बहनों, बेटियों को लेकर अचानक अप्रिय घटनाओं का समाचार मिलता है। मन व्यथित और गहरी पीड़ा से कराह उठता है। अतः सबकी जिम्मेदारी है कि जो बच्ची अपने से आपके घर को अपने वर के माध्यम से चुनती है उसे सम्मान और स्नेह दें। उसे जीवन जीने की जगह दे, अपनत्व दें। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और निवेदन है कि हर मातृ शक्ति का सम्मान करें। बहुओं का विशेष रूप से अपने घरों में ध्यान रखें।

और.. कितनी मर्यादाएं निभाती वो

सच बोलो, एक जान तो 

थी न! वो

पिता,भाई, भाभी, मां… बहनों.. ने 

कितनी कितनी, वर्जनाएं, सलाहें, 

रोक की भारी, भारी, 

हल्की, गहरी शालाएं, दुशालाएं, 

विदा होने के पहले, 

ओढ़ाईं उसको।


ये मत करना,वो मत करना

ऐसे रहना, वैसे मत रहना! 

जीना तो था न,उसे

सांस, तो लेना था न,उसे,

आखिर,उस घर में आगे

रहना भी, था न उसे 

इसलिए सोचती रही, 

निभाती रही,कुढ़ती रही 

चलती रही...

कितने दिन चलता ऐसे

भीतर ही भीतर गुनती रही

सूखती रही, घुनती रही..

कोई रास्ता तो चाहिए न!

हर किसी को, कम से कम

जहां वह, अपने से, 

आप से

मिल तो सके।

पर, सब बंद, बातें बंद, 

रास्ते बंद, हवा बंद! 

आखिर क्या करती, 

एक दिन, विवश हो झूल गई! 

सोचता हूं! 

आखिर इतनी मर्यादाएं… 

वर्जनाएं, रोक और संघर्षनाएं 

निभाती  कितने दिन.

जिंदा रहती.वो? 

किसके भरोसे,कितना जीती वो? 

जय प्रकाश मिश्र

शीर्षक: क्या वो मेरी जिंदगी हैं!

जाती हुई लहरें, लौटती… हैं 

उधम छोड़ शांत होती हैं।,

वो देखता है, चुप बैठा 

एक….टक उन्हें

कैसे फेन से भर जाती हैं, 

मोतियों भरी उज्ज्वल टोकरी सी 

सफेद हो जाती है

उठती हैं, गिर जाती हैं

हवाओं में फंस, उतराती हैं, 

झागों से भर,कितनी उत्कण्ठित हो

क्षणों में ही विगलित होती

लय-विलय हो जाती हैं

फिर भी…

नाचतीं हैं, इठल करती है

गिरती हैं, मचलती हैं, 

हिलकोरे लेती, हिलती हैं, 

मिलती, जुड़ती हैं, नाग सी उठती हैं।

क्या वो मेरी ही जिंदगी हैं! 

जय प्रकाश मिश्र

भाव: आज विदेशों में और अपने देश में भी लिव इन रिलेशन या मुक्त जीवन जीने के लोग हिमायती हो रहे हैं। परिवार के बंधन, पति पत्नी के बंधन उन्हें स्वीकार्य नहीं। उन्मुक्त जीवन स्वछंद जीवन चाहिए। पर समाज और वृद्धता की दृष्टि से यह श्रेयस्कर नहीं है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।

बड़े मुश्किल से बांधा, 

बंधनों में, उस समय...  

जब मुक्त था, स्वछंद था, सब...  

कल्पना जिसकी लिए 

तुम घूमते हो,  आज मन में।


यह जगत सारा 

तृप्त था क्या? 

दुख भरा था, ब्रिमो तक, 

जो बह रहा था, नारि-नर के बीच तब।


परवरिश का ध्यान रखकर

नवल शिशु का मान रखकर

बांट कर, दायित्व उनके

घर बनाकर! 

जोड़, जोड़ा परिणयों का।


स्वस्थ हों सब लोग 

आज वे तेरी तरह

पर मुमकिन नहीं था।

आज भी यह व्यवस्था है 

चल रही

पीढ़ियां दर पीढ़ियां हैं 

खिल रही

मुक्तता बहुत सुंदर वस्तु होगी

पर नियति के द्वार पर 

वह खड़ी होगी

एक दिन! 

सच कह रहा हूं मान लो

वृद्धता का भी थोड़ा संज्ञान लो

छूट जाएगा सभी कुछ मान लो

परवरिश भी चाहिए उस उम्र में।

जय प्रकाश मिश्र


 




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