एक सच कहूं!
एक सच कहूं!
अबकी देखा उसे,
लगा मुझे, ये वो नहीं;
यहीं बह रहा है, मीठा… चश्मा, कोई।
चुप चुप, अकेले, ठंडा, बहुत धीमा,
समेटे खुद में
सारे आकाश की गहरी नीलिमा,
व्यक्तित्व में संजोए वो..
भीतर से शांत,
अभय, शीतल, निर्मल,
संवेग शून्य, रसता, विरस लयरस।
कैसा हो गया है, लगता है
बूढा हो गया है?
क्या सचमुच, शांत, बच्चा बन गया है?
झांकता था मनों में,
कभी झरता था
चंचल झरने सा, इर्दगिर्द मेरे,
बहता था, गिरता था, उतने ऊपर से,
यहां दिल तक, नीचे… गहरे में।
गीत गाता था,
होठों के कोनों पर
ताजी हंसी, रोक, इतनी सी,
बिल्कुल अपनी सी
उथले ही मुस्कुराता था
अनथक मधुर संगीत, बहाता था,
मंद्रिल उठती तान सी, मेरे पे बजाता था।
साथ इसके, वायु यंत्रों सा स्वर
उभरा है, निकला है, गूंजा है मुझमें
ऋतुओं के आते जाते, फूलों के झूलों में।
मैने भी सुना है, इसने भी सुना है
लेकिन आज जब मैं मिला
इतने दिनों बाद,
ये रोया है
पर मुझे मालूम है यह
इस दौरान कहीं भीतर से
दुखद... हंसी हंसा है।
जय प्रकाश मिश्र
शीर्षक: इसके ये गीत
इसके ये गीत अनुगूंज हैं,
उन हवाओं के
जिनके परों पर कभी
ये शख्स, निश्चित उड़ा होगा।
आपके ये गीत,
मेरी अमानत है, क्योंकि
सबकी जबां पर, आखिर
ये ही तो चढ़ा होगा।
मेरे ये शब्द,
मेरे मस्तिष्क की, सांसें हैं
लेने दे इन्हें,
निकलने दे इन्हें.. बाहर तूं,
मर जाऊंगा, बिन मारे,
सच कहता हूँ,
सहज गीत, बनने दे इन्हें।
जय प्रकाश मिश्र
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