पांव में बंध बज रही है घुंघरुओं सी आज अब।
भाव: जीवन के पहलू अनेक, कहीं रूपसी, विशुद्धा, पतिव्रता, पतिता, भ्रंश, कुलटा, कामिनी, मायाविनी, और विभ्रमा देखी है मैने। आसान तो अत्यंत आसान कठिन तो करालिनी अनिवर्चनीय, अकथनीय है इसकी गति। पर जब हारती है तो.. क्या होता है और हराने के लिया कितने यत्न, प्रयत्न, करती है। इसी सब पर कुछ लाइने पढ़ें और आप मात्र आनंद लें। अविगति गति कछु कहत न आवे।
मत पूछ ऐ जिल्लेसुभानी
जिंदगी क्या चीज है?
देखी, इसे कई मर्तबा
पास से,
फिर भी मुझे,
दूर.., जी हां
दूर..., ही, लगती रही ये।
क्या कहूं!
सब... समय की बात है
आवरण... ओढ़े हुए, यह,
दूर... की बरसात है,
ऐसा लगा था!
पर आ गई जब धार पर!
मजधार लेकर, द्वार पर
तो, भीगता… मैं खड़ा…,
रात.. पूरी, कंपकंपाया, साथ इसके
था मुस्कुराया,
साथ जिसके, बहुत पहले।
कैसे कहूं
यह, बह गई बरसात है?
पर क्या!...
यह, बह गई बरसात है?
जी, नहीं
यह दलदलों में धंस... रही
भारी कोई, सौगात है,
भारी कोई सौगात है।
पर,
एक सच कहूं,
देखा है मैने, कुछ के लिए
यह जिंदगी
बह… गई, वर्षात.... है।
सच.. कह रहा हूं!
कुछ के लिए, देखा है मैने...।
तोड़… दी, जिनकी कलाई,
पकड़.. कर, मरोड़ कर,
है हाय! इसने।
घेर.. कर,
भीतर से बाहर, एक कर,
पटक.. कर,
रास्ता कोई, नहीं
छोड़ी, अरे! ये...
विकल.. कर,
रात दिन मथती… हुई
कितना.. कहूं,
है सताया….
इसने उसे, दिल खोलकर!
भाव: किसी किसी का जीवन आसान नहीं, यह जिंदगी कठिनाइयों के इतने क्रूरतम भंवर में फंसा देती है कि हंसता खेलता जीवन टूट जाता है। और झंझावातों में बिखर कर खंड खंड हो जाता है। विकल और व्यथित मन की एक ऐसी भी स्थिति आती है कि इसके जाल से वह सदा के लिए मुक्त ही हो जाता है और उसका मस्तिष्क इन विकट समस्याओं पर प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है।
पर! हार कर!
अब हर तरह, पीछे लगी है,
खुद, बंधनों में बंध गई है
मुक्त कर, हर बंधनों से,
आज! अब!
घूमती है, रात दिन,
बात करती, अनवरत,
उससे अकेले।
कभी बीते दिनों की,
कभी यह आज की, बेलौस होकर।
हंस रही है, निर्लज्ज सी
कैसी हंसी, कैसे बताऊं
किसको सुनाऊं
आप बीती बात है, कैसे न लज़ाऊँ।
जो जिंदगी,
तब दाब... कर
मुझको खड़ी थी पांव नीचे!
जिंदगी के रास्तों पर...
पांव.... में बंध
बज... रही है घुंघरुओं... सी
आज... अब।
भाव: एक सीमा के स्ट्रेस के बाद सिस्टम फेल अब जीवन के दर्द अनुभूति से विलग और मस्तिष्क हर सोच से बाहर कभी वर्तमान में कभी अतीत की गलियों में समय की सापेक्षिकता से मुक्त।
जय प्रकाश मिश्र
स्वरचित मूल रचना
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