तरल मन बहने लगा है, फागुनी बयार के संग
सभी को होली पर्व की शुभकामनाएं।
भाव: फाल्गुन की हवा में बसंत के फूलों का सौरभ मिलकर उसे मदहोश कर देता है। मानव शरीर और प्रकृति में रस, नवरसता हैं। यौवन अंगड़ाई लेता है। तन मन दोनों परवश हुए से लगते हैं। और लोग अपने प्रियजन के सानिध्य की कामना करते हैं।
बह.. गया तन, बह.. गया मन
फागुनी.. बयार के संग..
यह आज.. सबको क्या हुआ है
गा रहा है, नाचता.. है
हर एक जन, प्रियजन सा बन।
भाव: होली के त्यौहार में लोग थोड़ा उन्मुक्त हो ही जाते हैं, ऊपर से फगुनहट की बयार लगते ही तन मन से विचलित हो जाते हैं। तिसपर पिचकारी की धार से तन ही नहीं मन भी कहीं न कहीं भीग ही जाता है और रंग की बौछार में भीगे भीगे लोग देखते ही बनते हैं जब उनके वस्त्र शरीरों से चिपक कर स्वस्थ शरीरों की सुडौलता और सौष्ठव को और अधिक सौंदर्यमय बना देता है।
तरल मन बहने लगा है
फागुनी बयार के संग
पेंग लेकर झूलता है
झूमता है,
झूलते एकसार होते
उन्मुक्त गीले... वसन संग।
भाव: फागुन में लोगो का मन गेंद की तरह उछाल मारता है। साथ ही साथ रंग खेलते समय पानी से तर-बतर पानी से भीग जाने पर पानी के गुण लहरें और उर्मियां रंग खेलते लोगों के साथ जुड़ जाती हैं। जो क्षण भर के लिए ही सही होलिकारों की दृष्टियों में लय विलय होती रहती हैं।
कन्दुक बना, यह कूदता है
पाट पर उस जलधि के तट
उठ रही, गिर रही, कभी तन-उतनती
हो रही.. काल कवलित
लहर के संग।
भाव: कई लोग कभी कभी श्यामल रंग की मिट्टी घोल कर पानी के साथ हमारे ऊपर डाल देते हैं वे लोग और मिट्टी के साथ लिपटा अपना ही शरीर पानी में भीग कर एक अलग आनंद की अनुभूति करता है। सारे उपमान समाप्त और हम एक रंग एक तन बन जाते हैं। शंकरत्व की मद्धिम अनुभूति तब होती है।
शीतली सी, श्यामली सी
मृत्तिका जल घोलकर
ऊपर मेरे ही ढारती
वह..
अच्छी लगी,
क्यूं जब तन छुई..., छूई-मुई
वारि की सी धार बनकर,
अंग लग, रसधार सी,
हरि-हर
हलाहल हो गई।
भाव: होली में रंग से पुते चेहरे पहचान में नहीं आते व्यक्तिगत सुंदरता शरीर के सौष्ठव में मिल जाती है। सारे लोग अपने हो जाते है और प्रिय लगते हैं।
देखता मैं रह गया,
रूप सारे
एक होते जा रहे हैं,
रंग पुते, पुतले बने,
खेलते हैं, दूर से नजदीक से
हर ऊंच नीची भावना से, परे हट कर
सच कहूं! प्रिय..
मुझको लगे।
भाव: होली रंग का पर्व है सभी रंग में मिलकर एक से हो जाते हैं, चमड़े का रंग और मुंह के सुंदरता और आंखों की सुंदरता सब समाप्त हो सारे एकरस हो जाते हैं। यही समावेशिता और एकरूपता भेदों को मिटा कर सौहार्द्र भर देती है माधुर्य और अपनापन का देती है होली मिलन का आनंद का सारे गोरे काले के भेद का समापन है।
रंग सारे गर्म थे,
जो उड़ रहे थे
पार्श्व में,
अठखेल करते फिर रहे थे
एक ऊपर एक, सारे...
पुत रहे थे
रूप को आगोश में ले
कह रहे थे
मधुरता सौहार्द्र में है,
प्यार में है
होलिका के रंग में है,
संघ में है
मुक्ति के आनंद में है,
एकता के पर्व में है।
जय प्रकाश मिश्र
स्वरचित मूल रचना
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