रुलाने तक, हृदय से रोतीं थीं ।
भाव: आदमी के दोहरे चरित्र को उजागर करती ये पक्तियाँ दिखाती हैं कि हम आज जीवन से कितना भटक गए हैं। हमारा आज सच्चाई से लोग कितना दूर हो गए है। अपना विश्व कितना दिखावटी में दयालु, विचारों में आदर्श वादी और वास्तव में क्रूर है। इस पर कुछ लाइने पढ़ें हम आज हर चीज की मार्केटिंग कर रहे हैं संवेदनाएं और भावनाएं होली की पिचकारी के साथ बाजार में बिक रही हैं। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।
एक तस्वीर
लगा रखी है, उसने
सभ्य, भव्य, दिव्य, आलीशान
बैठक के, कमरे में।
जतन से, सलीके... से
बेहतरीन, आयातित,
फलकनुमा, तिकोने..
झल झल.. झलकते,
महोगनी की मेज पे,
खरीदा था, इसे,
शौक से!
नहीं, बढ़ कर उससे,
शान... में
जी हां, अभिमान में!
दिखाते... हुए, आब
आस पास..., उसदिन
सामने सबके..।
जितनी महंगी तस्वीर,
उसकी.. दूनी
दरियादिली दिखाई थी,
उसने नीलामी हाल में,
उस तस्वीर के चलते
केवल उसी की बात,
गुंजाई थी उस दिन उस हाल में।
वो बडी अंतरराष्ट्रीय, नुमाइश थी
नीलामी भी थी,
कुछ चुनिंदा कृतियों की,
सच है, उन बेशुमार कृतियों में
कुछ गजब की हंसती थीं,
कुछ दिल भरे रुलाने तक,
हृदय से रोतीं थीं ।
वो फोटोज़ अदभुत थे,
बेमिसाल थे
दिल को गहराई से
छूते ही नहीं, कमाल थे।
पक्का कहूं,
सच को, नग्न दिखाने में,
सौ पर्सेंट कामयाब थे।
वो रंग.. वो अदाकारी...
भावनाएं.... कृतघ्न मानुष की भी
अंदर से ख़खोर देती थी,
बटोर कर संवेदना,
संवेदनहीन के भीतर
उसे संवेदनशील, कर देती थीं।
उकेर देती थी
यादें,
सपनों में देखी
किसी, कभी
प्यासी, विवश, बेबस, तरसती
पर साथ ही अजीब सी शरबती
निरीह, कुछ कहती, पर चुप रहतीं
जाने कैसे
अन्तस तक पहुंचती, विभोर करतीं।
देखने पर लगता, उसकी आंखे
हेल्प मांगने की
सबसे ऊपरी अंतिम
सीढ़ी थीं।
और क्या कहूं,
उसके घर की कामवाली
जब जब,
उस तस्वीर को देखती
उसके दाम पूछती
सुनती
फिर पसीने पसीने होती
गीले हाथों उस तस्वीर को पोंछती,
आंखे भर कर, रो देती,
सोचती!
क्या! दुनियां में दरिद्रता,
बेबसी, मजबूरी, आंसू लिए
मूर्ति, इतनी महंगी भी होती होगी।
वो सचमुच निहायत नीचे
तपके की गरीब थी,
बेसहारा थी, बेबस थी,
जीवन से हारी, जीवन थी
दो जून की रोटी के लिए
अभागी
और उस तस्वीर से
ज्यादा सजीव
अपनी बच्ची को चुप हो
एकांत में, अकेले में,: घर आकर
घंटों तकती थी।
यह किसका दुर्भाग्य कहूं!
उसकी बेटी, वहीं बाहर,
भूख से तड़पती
उन्हीं लोगों के सामने रोज,
खून के आंसू रोती थी।
वो नेक कामवाली
उस ईश्वर को फिर भी
जिसने लोगों की पसंद और
वास्तविकता में इतना अंतर बनाया था
केवल चुप हो, कुढ़ कुढ़ कोसती थी।
पर फिर भी उसी से मांगती,
उसी का सजदा करती थी
उससे उस तस्वीर सी रूप वाली
बेटी की मांग,
केवल पैसों के लिए रखती थी।
जय प्रकाश मिश्र
बच्ची थी वो सांवली सी निहायत गरीब थी।
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