जिंदगी में वो फिर हंसे, फिर मुस्कुराए।
भाव: आज हमारी पढ़ी लिखी बहने और बेटियां अपना संसार बसाने के लिए अनेक समस्याओं से जूझ रही हैं। जीवन के दोराहे पर खड़ी, अनुभव की कमी और समाज की आज की नागफणी से लड़ रही है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें बन पड़े तो कुछ सार्थक करें भी।
वह, खड़ी है सड़क पर,
अब किधर जाए,
हाथ में कुछ फूल हैं,
ले उन्हें,
वह भ्रमित.. है, सोचती.. है
किस.... देवता के सिर चढ़ाए।
वह ख़्वाब था, या सत्य था,
कैसा भरा अपनत्व था
खुश थी वह, सब भूलकर
पर! यह अचानक क्या हुआ
दांव वह! अब कौन सा, उस पर चलाए।
मलिन है,
यह नलिन अब,
वह,
यह... सोचती
मुड़.. चली, कैसी.. गली,
पांव... उसके थक चुके थे,
सांस... भी तो बंध... रही थी,
मीत.. अपना, रास्ते.. का,
जिंदगी.. का
इस हाल में, कैसे, कहां,
किसको बनाए।
फंस गई है, विकट ही, इस स्थिति में।
बेबसी की राह पर, चलती रही वह
जाने न कितनी
शाम यूं, ढलती रही वह
हर चमकते पांवड़े में धूल थी
सच कहूं, मजबूर थी वह
खोजती थी मंदिरों में (घरों में)
दिव्यता के देव की, प्रतिमूर्ति वह (भला)
पर,
जब भी मिलती पास से
उस देवता के रूप से
व्यथित थी वह,
सब ईंट थे,
पत्थर भी थे कुछ
भावना से दूर थे, आदमी वे थे कहां!
आखिर यहां,
इस हाल में वह, और आगे कैसे जाए।
कोई बताओ
हल उसे, रस्ता तो दो,
जिंदगी में वो फिर हंसे,
फिर मुस्कुराए।
जय प्रकाश मिश्र
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