ऐ जिंदगी! रुक तो जरा, बात तो कर..

भाव: देखा है, जीवन की उधेड़-बुन में, लोग ऐसे उलझे कि पार ही नहीं पाते।  बच्चों की चिंता और जिम्मेदारियों को पूरा करने, हमारे कंधे झुक जाते हैं, अनेक लोग निराशा के कगार पर मिलते हैं। लेकिन हम सभी को समझना चाहिए कि हर जिंदगी अपने में पूर्ण है और अपना मार्ग समय पर अपनाएगी ही, वह आगे बढ़ेगी ही, कुछ न कुछ करेगी जरूर, अपना आधार बनेगी। हां हमारे अनुसार नहीं, पर अपनी मौलिकता में स्थान लेगी। यद्यपि जीवन ऊर्जा से भरा आशा की किरण है और अगर शाश्वत नियम:  सत्य, साहस, प्रेम, करुणा अपनाकर झूठ, फरेब से दूर रहेगी तो दुनियां बेशक न पाए, पर आत्मतुष्ट हो आनंद से पछतावा रहित जीवन जीएगी। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

जिंदगी मेरी, 
ये... है क्या? 
उन्वान है, उम्मीद का
छाया नहीं है, 
चुप चलती रहे
पीछे किसी के, उम्र सारी, 
जिंदगी तो बोलती है, 
डोलती है,
निर्णयों को तोलती है,
छोड़ती है,त्याज्य को
यह सृजन है,
अंकुर सरसता
उर्वरा है,
बदलती है सृष्टि को।

हार क्या है? 
यह नहीं है, जानती! 
यह जिंदगी है, 
राह लेगी,आगे बढ़ेगी
कठिनाइयों को, पार करती
बुलंदियों के सिर चढ़ेगी।

जिंदगी उन्वान है
पर सत्य के जब साथ हो! 
शाश्वत नियम छोड़े नहीं! 
दया, करुणा, प्रेम का 
पथ, कभी छोड़े नहीं! 
तो क्या धरा.. है, 
इस धरा.. पर
यह, जिंदगी जीते नहीं।
जय प्रकाश मिश्र

भाव: जीवन के रंग सपनीले ही नहीं विविधता लिए होते हैं। कोई गुलाबी तो कोई कत्थई और अनचाहे भी होते हैं। समय के साथ सारी जीवन-गांठें खुलती जाती हैं और सपनों के सुनहरे पट जीर्ण हो फट, अलग हो जाते हैं तब जीवन के कठोर यथार्थ से आमना सामना होता है। आवरण हीन सत्य थोड़ा ज्ञानचक्षु ओपन करने वाला होता है। इन्हीं पर कुछ लाइने पढ़ें, आनंद लें।

आज देखा ध्यान.. से
रंग.. जीवन के 
थोड़ा गहरा रहे हैं
ये क्या हुआ है, 
आजकल
वो बिन बुलाए, पास मेरे 
आ रहे हैं।

भाव: जीवन के आरंभ में किशोरावस्था में जैसे जैसे जीवन का रंग गाढ़ा होना शुरू होता है हम आगे बढ़ते हैं संसार सुंदर लगता है, लोग आपसे आकर्षित हो खुद ही नजदीकियां बढ़ाते हैं। यह समय गुलाबी होता है।

यह शाम थी, 
कुछ और न था, 
दूर तक,सिंदूरी 
फिज़ा पर छा रहा था।
बेसुध घुमड़ते बादलों की छांव में, 
आज देखा,उन्हें मैने
पास से, 
अरे! कैसे,
पास आने से भी वो, 
कतरा रहे थे।
एक सच कहूं! 
रंग जीवन के,थोड़ा गहरा रहे थे।

भाव: जीवन की शाम होते ही, लोग आपसे दूरियां बनाना शुरू कर देते हैं या शारीरिक समस्या से आप ही लोगों से दूर होने लगते हैं। इस समय जीवन अपना रंग स्याह करना शुरू करता है। 

मोड हैं 
इस जिंदगी में! 
कैसे..कैसे, 
एक् एक.. करके,
सामने मेरे,निकलते, खुद-ब-खुद,
सब आ रहे थे।

जिनके लिए, मैने जवानी, 
गिरवी रख दी,
थपेड़ों से 
उम्र भर लड़ते रहे..।
वो ही अब, 
मुंह मोड़ मुझसे,आज,कैसे 
दूरियां रख, पास से ही 
जा रहे थे।
भाव: अपने समापन काल में यही जीवन ज्ञानचक्षु खोल देता है। सब साफ साफ दिखता हैं। समय सारे मोड़ों से परिचय कराता है। आपका शानदार अतीत और जीवन की शाम दोनों मिलते हैं अकेले में और बात करते हैं।

ऐ जिंदगी!तूं बैठ तो 
थोड़ा संग मेरे, एक पल को
बात कर तो
तुझको दिखाऊं.. 
लोग तुझको देख कर.. 
इस फ़टेरे हाल में
कनखियों से किस तरह 
मुसका रहे हैं।
आज देखा ध्यान से
अब रंग जीवन के, 
सही.. गहरा रहे हैं।
भाव: फिर हम अपने और लोगों के जीवन के बारे में बाते एकांत में करते है और समय की तराजू पर सब तौलते हैं। अब जीवन का गाढ़ा सुरभित मधुर या कसैला अप्रिय सारा रंग हमारे सामने आ छलकता हैं।
जय प्रकाश मिश्र

 


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