पखावज पर कोई देता हो ताल, कुछ ऐसा लगा

भाव: जीवन और इसके जीत-हार, जय-पराजय, हर्ष-विषाद, हानि-लाभ सब आश्चर्यजनक रूप से चमत्कारी हैं। कब, कौन, कैसे, कहां, कितना, ऊपर या नीचे होगा कहा नहीं जा सकता। पर हां जो इसे मूल रूप से गहराई में जीता और समझता है वह साधारण होकर भी कहीं भी कुछ ऊंचा कर और पहुंच सकता है। खुला दृष्टिकोण और नवाचार किसी को का ही भी ऊपर उठा सकता है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें। जीवन से परेशान नहीं इसमें डूबें। 

जिंदगी क्या चीज है, 
मैं सोचता हूं 
क्या बना दे, सुर्ख इसको 
एक पल में..
क्या गिरा दे गर्त में, 
मीनार.. से, 
उस बहुत.. ऊंची, 
एक.. क्षण में।

जर्द को, 
जर्रा बना दे,ख्वाब में ही,
ख्वाब भर दे, 
मंजिलों के
पर लगा दे, 
शुर्खाब... के।

आफताब.. कर दे, 
रौशनी... के 
घर पे चढ़, 
भाग्य को, 
ठेंगा दिखा दे।

देखता हूं! बिस्मरित हूँ! 
चकित हूं! सब नहीं, 
कुछ!राज इसके भांपकर,
मैं थकित हूँ।

रंग इसके देखकर!  
दिग-भ्रमित हूँ.. 
एक बम्बू, 
गांव... के उस बांस का 
गांठ.. का, 
इतना व्यवस्थित, 
दूर... उस आकाश तक
इतना... सुरक्षित
देखता.. वह मौन हो, 
डूबता.. 
भीतर... गया
स्वर्ण की मछली पकड़ 
कुछ देर में, हाथ में, 
मुस्कुराता, सच कहूं! बाहर हुआ।

अरे! वह ठान बैठा, 
गांठ-से, दर-गांठ पर 
बस सोचता, 
वह मान बैठा, 
है यही आधार, 
उस तकनीक का
जिस तकनीक पर वह
पांच सौ... मीटर की बिल्डिंग*.. 
इस धरा पर,पिछले दिनों ही 
तान बैठा।
उस तरह, जिस तरह, 
एक गिरता सेब देखा 
एक ने
दुनियां बदल दी यार!  
उस दरवेश ने।
जय प्रकाश मिश्र
* अभी पिछले दिनों ताइवान में चार सौ इकसठ मीटर ऊंची इमारत की डिजाइन को बांस के गांठों से प्रेरित होकर उसी सिद्धांत पर तैयार कर बनाई गई है। जिंदगी में आइडिया अकस्मात ही आदमी को हीरो बना देता है।

पग दो: गरीबी और प्रकृति का संग

घर 
टपका 
आज मेरा
कुछ इस तरह यारों! 
टपकते थे, कभी बचपन में, 
बागों में मेरे, 
छतनार,छतराए छत्तों से 
एक एक कर,तब महुए ताजे।

लटकतीं रहीं,बूंदे ऊपर
कितनी... देर तलक, 
ढुलमुल..करतीं
प्यारी प्यारी,चमकतीं हिलतीं!  
न्यारी न्यारी,लुभाती मुझको
जैसे आकाश से
उतर आई हो टिमटिम करती 
तारो की बारात, 
मेरे घर पे।

किस तरह बूंद से लटके हुए
ताजे! महकते महूए, 
मेरे बाग-ए-आंगन में
सुर्खरू हो, 
रूबरू होकर मोतियों से
टंग जाते थे सुबहो-सहर,
बड़े धीमे से, 
पखावज पे कोई देता हो ताल
कुछ इस तरह 
चू जाते थे 
टप टप टप,टप टप टप
जमीं को छूते-छूते।


जय प्रकाश मिश्र

भाव: जब हम मुफलिसी में या गरीबी में जीते हैं तो निश्चित ही प्रकृति की गोद में ज्यादा, नजदीक होते हैं। और उसे अनुभव भी करते हैं, खुला दीवार रहित घर, विशाल फैला हुआ ईश्वर का साम्राज्य, प्राकृतिक जीव जंतु से निकटता स्वतः ही मिल जाती है। हवाओ की ताज़गी, सुबह की मलयानिली बयार आकर वस्त्र रहित तन को स्पर्श कर धन्य करती है। उस गरीबी का फक्कड़पन भी गजब का होता है।


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