प्रायिकता का गणितीय विचार ही तो है ए.आई.।

ए. आई. 

दूर का सुंदर गुब्बारा.. 

छुपा है जिसमें अद्भुत पिटारा 

आज का, हमारा सच सारा का सारा।

यह बदलता रहता है, 

हर रोज, हर क्षण पल प्रति पल..

जैसे जैसे बदलते है हम,

समेट लेता है हमे, हमारा आस पास 

पास पड़ोस वर्तमान सब।  

हमें, भीतर, बाहर, अन्दर, 

हमारे उठने, बैठने, करने से लेकर

क्या करेंगे, हम

अगले क्षण जान लेता है।

संकुल गणित की गणना कर

फिल्टरों में छान, पक्का अनुमान लेता है।


आप इसे अच्छे से जान सकते है

किसी ने कहा है, अगर आप 

कोमल, कठोर को अनुमान सकते हैं

तो, प्यार हो या प्रेम, उसमे, नहा सकते हैं।

ऐसे ही अगर आप 

इस दुनियां में जी सकते है 

तो ऐ आई को अच्छे से समझ सकते हैं।

आइए, मिल जुल के 

जरा, इसकी गैलरी में चलते हैं।


हमारी तुम्हारी और उसकी 

आदतों को समझना...

हम सभी के आपसी, विरोधी, 

निजी, सगी, भूली...

जरूरतों, इच्छाओं, संबंधों, 

मिज़ाज़ो, शौकों, प्रतिरोधों, को

विभिन्न दबाओं, लालचों, चाहतों में

बदलते देखना, 

उम्र के साथ उभरती आशाओं, 

कल्पनाओं की उड़ानों 

कामनाओं, वृत्तियों, विचारों को पढ़ना,

उड़ती चिड़िया के पर गिनना। 

सभी की, 

सभी तरह की 

भूख-प्यास, बीमारी- विकार, 

ख्वाइश, के साथ साथ 

होनी, अनहोनी की प्रायिकता का

गणितीय विचार ही तो है ए. आई.।


बस इनको थोड़ा 

समय की प्याली में, करीने से पिरोना, 

बहने लगे तो, बिग बिलियन डेज में बदलना

पर न्यूनतम की सीमा और 

महत्तम के ज्वार को प्लानिंग से 

समय पर भुना लेना... या

अपने क्लाइंट को सबकुछ 

होने के पहले पैसों की खातिर

भविष्य-वक्ता ज्योतिषी सा बता देना

यही तो है यह ए.आई.।


एक तरह से पूरी दुनियां को..

सब कुछ को.. व्यापार बना देना

यही माडल तो है अपना ए. आई.।


पहले 

दो विधा थीं 

टकरातीं थीं, लड़तीं थीं, 

सबके हित थे, सभी में यही तो वे कहती थीं! 

एक पूंजीवाद और दूसरी तथाकथित

कम्युनिज्म कहलाती थीं।

अब पूंजीवाद और मार्क्स वाद ने 

दुनियां देखी, नुकसान देखा

व्यापारी, दोनों ओर ठहरे,  पैठे गहरे! 

साथ चलेंगे,  फील किया..

एक सच कहूं, बदला हुआ 

साझा... चोला पहना

हम सबका, मानव जाति का अंतररस जाना 

इसलिए एक ही सिद्धांत पर आगे बढ़ना ठाना।


दुनियां के व्यापार, और व्यापारिकरण पर

जो स्वतः स्फूर्त थी, स्वाभाविक थी

जरूरतों और आपूर्ति पर टिकती थी

शायद इसलिए धीमी थी, 

को मथ कर, नथ पहनाने की ठाना।

ए. आई. कुछ और नहीं 

विलय है 

दोनों ध्रुवों का पश्चिम और पूरब का

आपसी हितों को देखते, 

नया दिमागी विजय है।

सच कहूं सुविधाओं के नाम पर..

बड़े वैश्विक व्यापारियों का 

पुराने कहे जाने वाले मौलिक 

सिद्धांतों पर विजय है।

इसे सोचना! और आगे देखना।


चलो जरा!  इस ऐ आई के 

अहाते में घुसते हैं: 

अरे वाह! यह तो 

अपना, अपने लिए, अपने ही बनाए 

सा लगता है।

कितना महीन कर डाला इसने

पीस डाला अहा! उस अविजित काल को

जो सदियों से हमें डंसता आया है।

हमारी सारी, अनुभूतियों, आनंदों, सुखों,

दुखों, वेदनाओं, अरमानों, को 

दशकों, सालों, महीनों, मौसमों, दिनों और

घंटों में बाँट कर क्षणों, नहीं माइक्रो क्षणों 

में बांट कर 

हमारे निर्णयों, अनिर्णयों, अपेक्षाओं,

महत्वाकांक्षाओं को संग संग पीस कर

न जाने कितने फिल्टरों में छान कर रख लिया है।

इसके सहारे इतनी सुविधा और सुख!  

यह देगा जीवन अदभुत!  

जिसकी आज हम कल्पना कर सकते हैं।

यह सच है! 
आज की जरूरत है ऐ आई!  
जब हम भूख और बीमारी से ही 
पार नहीं पाते..
शिक्षा और स्वास्थ्य से 
उभर, ही नहीं पाते..
अपने स्वार्थी जीवन और आपसी 
लड़ाई से ही पार नहीं जाते..
बमों, बंदूकों, विनाश में ही मन रमाते..
आदमी पीछे, आदमी की सनक आगे
ऐसे में हमें कौन बचाए! छोड़ इसे..
इनकी बात करना बेमानी है...

तो यह ए. आई. 
हमारे आगे सुंदर, स्वप्निल, 
कल्पनाओं का भविष्य रख देगा।
हम नहीं बदलेंगे, तो यह हमे बदल देगा।
यह मैं भी मानता हूं, 
सच है जानता हूँ! 
आज की सारी अपेक्षित चाहतों को 
यह ए.आई. दे देगा।

लेकिन मेरा प्रश्न वैश्विक.. है 
आदमी का मस्तिष्क
जो सतत आगे भी बढ़ता... है
क्या इसकी बढ़ती नियोजित 
लौकिक सुविधाएं
उसकी स्वाभाविक गति को  
कुंठित कर रोक देगा...  
अब इस सामान्य मानव मस्तिष्क की गति
इस ए.आई. की गति से कम होगी 
वो गुलामी में आगे बंधता रहेगा? 
यह  मस्तिष्क जो मानव में सीमित था
अब तक सर्वोपरि था 
अब आगे इन असीमित सुविधाओं के लिए 
इस ऐ आई का गुलाम होगा।
क्या कुछ लोगों के मस्तिष्क के गणितीय निष्कर्षों के आधार पर दुनियां चलेगी।
क्या हमारे संसाधनों पर हमारी जरूरतों का नहीं, 
हमारे अनुमानों का अधिकार होगा।
और अगर इसका फेल्योर हुआ तो क्या होगा।
भाव: यह ब्लॉग मात्र आपके आनंद के लिए एक मनोरंजन इष्ट है। इसे अन्यथा न ले।
जय प्रकाश मिश्र



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