नियति की यह अनवरत गति..

मित्रों, आज की कविता थोड़ा हट कर है। जीवन  लोग दो तरह जीते हैं एक घुलमिल कर जीवन में एकरस हो गृहस्थ बन और दूसरा अपने लिए मुक्ति की कामना से जन्म मृत्यु बंधन से अलग होने के लिए साधु, संत, योगी, संन्यासी, फकीर, सेंट आदि। दोनों में क्या अंतर है जब कोई सन्यस्त होता है उसके पूर्व मां पिता उसे सामान्य ही जानते है। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंद लें।

भाव: किशोर अब जीवन बसाएगा उम्मीद बांधे दंपति उस दिन की अभिलाषा पाले क्या देखते हैं।

संभावना का विंदु, अंतिम! 

जगत लेगा जन्म! इसका नवीन अब! 

शेष सब निःशेष! 

आखिरी निर्णय बचा है मात्र 

इसका "शेष"

कुछ नहीं बाकी रहा अब! 

सोचकर वे खुश हुए,

नव कल्पना में खो गए।


अरे! यह क्या?  

मुड़ चला!  जीवन से वापस! 

विश्व की यह बेलि अब कैसे बढ़ेगी 

सृष्टि की यह अनवरत गति 

और आगे, 

हाय! अब कैसे चलेगी! 


सुख-दुख नहीं… संसार से, 

कलि-लता के स्वभाव से 

बिकल-नद की नाद से 

ही, नहीं.

इतनी प्रबल मझधार से…भी

मुड़ चला..

रोककर! कुछ सोचकर!  

अपने हृदय की बात पर! 

वापस हुआ है। 

लग रहा...

कोई "नया" निर्णय लिया है।

सोचकर यह दुखित हैं सब।


नियति की यह अनवरत गति..

सामान्यतः मारी हुई मति..

सारी समस्याओं की विसंगति

सुलझा दी हमने*।

कह रहा था..

क्या पूर्व* के इस रास्ते से हट रहा था? 


मैने सुना था..

वो* भेज कर उमको* यहां

आश्वस्त था,

राज उसका अब चलेगा..

विश्व पर, वह सोचता था।

कितना सुंदर अक्स देकर 

अहा! ऐसा 

रूप देकर, जन्म देकर, 

सतत नश्वर नेमतों के पास भेजा..,

नियति की मायाविनी के पास भेजा।


भूलने को स्वर्ग की वो लज़्ज़तें

झूलने श्रम के ये झूले, बरकतें  

झूले यहां आकंठ, 

हो, रसमग्न वो

ले हलाहल स्वाद 

हो विदग्ध वो..

खट्टा, मीठा और तीखा, 

अद्भुत अनोखा…

विषय रस 

जन्म से कई जन्म तक 

पीता रहे वो।


दुख का नश्तर, सुख की चाशनी

रिश्तों का नित बनता बिगड़ता व्यापार 

अंग धारों पर चीखती तृष्णा की सुखन..

मदिर नयन, 

यौवन की टपकन

टीसता, पिसता, रिसता मधुवन

यहां इस समय की घाटी में 

मृत्यु-प्रभात आने तक, 

जीवन में मधुवन-तृषावन के 

संगम ही संगम।


जीवन भरो, जीवन चखो

जीवनी एकत्र करो

राग, द्वेष, मद, मोह

मया, मैत्री, दया, लोभ

भूमि, धन, यश, करुणा, 

मया, लोक, बहती वरूना 

मन चाही चीजें चुनो

आनंद के सागर में बहो।


छोड़कर इतना अनूठा खेल यह! 

वह जा रहा है, 

कौन सा है, लोभ वह!  

जिसके लिए 

वह अकेला... 

छोड़ कर जग..., जा रहा है

सोचता हूं!  

किसके कहे पर जा रहा है।

क्या कही भीतर है कोई 

जल रहा..दीप सा

क्या रास्ता उसको वही आगे 

दिखाता जा रहा है।

मोक्ष का,..कल्याण का..

सुख शांति का..

पर कल्पना है, मित्र सारी 

पूछ लेना तुम किसी से

यदि नहीं तो मेरी मानो

एक पुस्तक पढ़ ही लेना।

जय प्रकाश मिश्र

एक किताब है तमिल में तिरुक्कुरल जीवन को व्याख्यायित करती है। अंग्रेजी में मै उसकी मात्र दो लाइने आपके लिए कोट कर रहा हूं। संख्या है.. 62

Those who children rear

The mesh of ribirth will spare.

अर्थात जो गृहस्थ हैं, मां पिता बनते हैं, अपने बच्चों को पाल पोष कर कष्ट से बड़ा करते है वही जीवन के इस जाल से, जन्म मृत्यु बंधन से मुक्ति पाएंगे। भागने वाले को सदा कुछ छूट गया का आभास जीवन भर बना रहेगा और गृहस्थ एक पूर्ण विकसित फूल की तरह अपने पेड़ से टूट कर  सूख कर पूर्ण जीवन जी कर फिर उसकी याद नहीं करेगा। मुक्त होगा।

जय प्रकाश मिश्र

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