नीति तुम्हारी, खुद तक बस थी।
भाव: मन स्मृतियों का गुलाम है। वस्तुतः सारा का सारा वर्तमान भी स्मृति के रूप में ही सुख दुख देता है। हम सुख तब पाते हैं जब घटना पूर्ण हो चुकी होती है। खुशियां जीवन में छोटी छोटी ही सुंदर होती हैं शेष जिम्मेदारी होती है और दुख मूल भी यही हैं। इन्हीं पर कुछ लाइने हल्की फुल्की आनंद के लिए पढ़ें।
चल छोड़ यारा...मोड अपनी धार,
अब वापस चलें...,
आ बैठ मेरे पास, बस कुछ देर
जरा खुद से मिलें।
चल.. निकलते हैं आज बाहर
आप से, खुलते हैं थोड़ा
खुद.. से भी बाहर निकल कर
इस फ्रेश हवा में, आज की,
छोड़ सारी बात पिछली
मिलते हैं थोड़ा...।
आज फिर.... बनते हैं बच्चे....
फिर, वही....
कानों में फुश-फ़ुश...
फुसफुसा कह.. दें वही, सुन लूं.. वही..
आज गलमानी* करेंगे, साथ मिलकर..
बस और क्या!
झगड़ते हैं झूठ में, फिर,
खेलकर
मिलते हैं, थोड़ी देर में, बाहर वहां पे।
आ चलें, एक बार फिर से,
उऩ पुरानी
खानकाहों* के तले
मिलते जहां थे हम अकेले
शाम को,
छिप खेलते थे, छुप्पम छुपाई
आंख से करके इशारे, भागते... थे
पकड़ते थे चोर को, हंसते गजब.. थे।
क्या कह रहे हो!
बड़े! ज्यादा हो गए हो!
बच्चों के दादा बन गए हो..!
चल छोड़ अच्छा..
यार ये सब..
पर खुशनुमा.. एक क्षण
तो जी.. ले साथ तूं अब!
आ, पास आ,
कुछ पेंट ही कर, दिल में है जो..
कोई कहानी
बेशक पुरानी, मुझसे तो कह!
चल पि-आनो तूं बजा...यारा
आज फिर से।
छेड़ दे, वो ही पुराना, फिर से गाना
दिलकशी का आज मुझसे।
ये भी नहीं अच्छा लगा,
चल छोड़ अच्छा..
चल किसी से, मिलने तो चल..
उतार दे सारे ये कपड़े देख तो
कितने पुराने हो गए हैं,
रंग से, बेरंग, कैसे हो गए हैं।
निकाल अपनी वो पुरानी
कमीज़ काली.. नखरों वाली
आज फिर से
पहन उसको.. यार दिल... से।
याद कर वो महफिलें,
उन महफिलों में डूब जा
तूं, आज फिर से,
खुश तो हो
एक बार फिर से।
चल, पुराने रूप में, मिलते हैं सब
आज फिर दरिया पे उस
चलते हैं सब।
छोड़ो अतीत के सारे दुख!
चिंता छोड़ो भविष्य की सब!
आओ बनते है आज अभी...
क्षण इसी, बचपने का ले रस।
फिर उन्हीं कदंबों के नीचे...
श्रीकृष्ण मंडली के मेंबर,
चल हम स्वतंत्र होकर फिर अब
जीवन आनंद उठाते हैं
सचमुच में खुश हो जाते हैं।
जय प्रकाश मिश्र
पग दो: खुशियां
ये खुशियां कहां रहती हैं?
खोजने लगा एक दिन!
बहुत खोजा और
पाया उन्हें दुबके हुए
पीछे अपने,
कोने में
जहां बस मैं, ये जीव नहीं
बस मेरी चेतना
इस शरीर में हंसती
अकेले खड़ी मुस्कुरा रही थी।
खोजता हूं उसे बार बार
पर मिलती कहां है,
हर बार...
हर बार ये दुनियां..
मुझपे हावी.. रहती है
क्या इसलिए?
वो वाली खुशी... मुझे प्रायः
नहीं मिलती है।
जय प्रकाश मिश्र
पग तीन: जीवन में नेक रहें
सारा जीवन... दौड़, दौड़ कर
पाया भी तो क्या
वही सादगी, सच्ची, अच्छी
और नहीं तो क्या!
एक दिन पूछा बिन कुंतल से
सारा जीवन किए इकट्ठा
कौन कौन सी जुगत लगाई
इतनी कमाई कहां से आई
बांट रहे हो बारी बारी
दुनियां भर में पीट ढिंढोरा
बना बना फाउंडेशन, घेरा।
जिनको जरूरत उस दिन तक थी
तब नीति तुम्हारी,
बस खुद तक थी।
भाव: अपने तपने के दिनों में, पावर के दिनों में अगर सभी ईमानदारी और न्याय करें तो मानव आज सुखी हो जाए। आखिर हमे शिकायत किससे है उसका कारण पावर वाले लोग ही हैं जो बाद में नाटक कर सेवा क्षेत्र में आते है। इन्हें आत्मग्लानि होनी चाहिए।
जय प्रकाश मिश्र
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