रस कहां है?

भाव: रस कहें या आनन्द या अध्यात्म की निर्झरी या प्रभु प्रेम का आनंद सब एक ही है। रस और रास हमारे यहां परस्पर सन्ध हैं। आपस में परस्पर ओत प्रोत है। "रसो वै स:" वह परमात्मा रस ही है। इन्हीं पर कुछ पंक्तियां पढ़ें और आनंद में डूबे।

उसने पूछा आज मुझसे!  

रस कहां है? 

क्या बताता... 

सच कहूं तो रस वही था 

प्रेम का..

बह रहा था रगों में 

मेरे सरस सा।


एक रेला जलद का 

ले भर चला 

जल बिंदु…सारे… 

फैले पड़े थे 

पास मेरे.. आज तक रसते रसाते 

चढ़ चुके… उन यात्रियों…से

जो चाहते थे.. देखना

भ्रमण करना, रसिक बनकर

जगत सारा, 

क्षण क्षण बदलता, रूप लेता

सौंदर्य अरु माधुर्य को 

अंग अंग सिरजता

रस में समसता 

बूंद बन... टप टप... टपकता

रस तो यहां था।

 

लूटना आनंद रस...

खिल रहे नव पुष्प... का

फिर लौट आना सौंध.. में 

चुप..बैठना, यह पाप है, 

रस नहीं है,

यह अलग है यार मेरी संस्कृति से।

एक सच कहूं...

आनंद में ही डूब कर आकंठ 

उस संग घर बनाना..

प्यार में ही प्राण का उत्सर्ग देना, 

स्वयं का..बलिदान देकर यश कमाना.. 

बरसना, तृप्त करना तृषित को..

उष्णतामय लूह को भी 

शीतलित कर शमित करना.. 

हिम किरीट बनना 

शीर्ष पर 

किसी तुंग पर नगराज का.. 

चमचम चमकना, 

अरुण की नव रश्मियों संग खेलना

त्याग कर सर्वस्व का 

हर याचना का, 

स्नेह का, 

प्रेम का, प्रार्थना का, 

विनय का, सठ धर्म का

निष्ठता से प्रेम-पगना, प्रेम करना 

पूर्णता को प्राप्त कर, सन्यस्त होना..

और क्या है रस यहां, 

रस को समझना रास है..

रास ही तो कृष्ण.. है, 

क्या कृष्ण राधा से अलग हैं

या अलग है रस, प्रभू से 

बैठ कर कभी सोचना,

यह रस कहां हैं।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो: पर्जन्य प्राण हैं

बढ़ चला, जलपोत सा 

कंधों पे अपने, लादकर उस सिंधु से 

उठता हुआ 

वह मेरु पर्वत सा दिखा 

अभयंकर भयंकर 

नाद करता 

विश्व की उस यात्रा पर 

धरा जिसको पूजती है, देव सा

सम्मान देकर, प्यार से है जोहती वर्ष भर

बादल हैं वे, 

मार्ग है जीवन का मेरे।

प्राण हैं इस धरा का अन्न हैं वे

सूखे नहीं वे सरस हों 

सांवले चंचल रहें बरसा करें 

इस भूमि पर ऐसे प्राण दें।

जय प्रकाश मिश्र 


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