बहुत बाकी है सफर..
भाव: जीवन, नवीनता का उत्स है और परिवर्तन ही नवीनता है एक तरह से यही समय भी है। यथास्थिति, अक्रियता, अविनाशिता कालचक्र का उल्लंघन है। इसलिए कुछ करते रहें, आगे बढ़ते रहें और आनंद लेंते, चलते रहें। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें।
बदलाव ही जीवन की सच्चाई है
बदलाव ही तो जीवन की गहराई.. है।
बदलाव नहीं तो
जीवन पड़ाव है, कुंठाओ का...
समझो, सड़ता... पानी है.. रुका।
अरे! यह तो
अभिलाषाओं का... बसंत है
कड़ियों में जुड़ा अनंत है,
चलो इसलिए बदलते हैं...
आज, फिर एक बार
आमूल-चूल..
फ्रेश से भी, आगे, रिफ्रेश होते है।
नई चीजें, नई उमंगे,
नई ऊंचाई
जीवन की, यही तो है.... सच्चाई।
चलो.. कुछ दूर और चलें...
नई आशाएं पालें...
अभी, बहुत... बाकी है, सफर ..
उम्मीदें सलीके से सजा लें,
एकबार और हल्के से
भीतर अपने कुछ गुनगुना लें।
थोड़ा और आगे तो बढ़ो..
सभी, मिल जुल, कुछ
अच्छा भी करो,
कुछ सच्चा भी करो ,
किसी भी, उम्र ही में सही,
कुछ बेहतर सोचो, कुछ बेहतर भी करो।
जय प्रकाश मिश्र
पग दो: जीवन उत्स
क्या "उम्र"
इसके, उछलते इस हृदय को
सीमाएं बना कर बांध लेगी,
काल की इन रसविहीना
रज्जुओं से!
पूछ बैठा
एक झोंका शिशिर का
पास में ही बह रही एक, पतझरी से..!
सुन इसे..
बसंत में बहती हुई, एक रसभरी,
रसधार में डूबी हुई..
कुंनमुनाती फागुनी, फगुनहट बोली..
संजीदगी से..
देख कैसे,
कोंपले ये, निडर हो के,
निकलती हैं
काल के कपाल से ऋतुराज के
अधखिले...., खिलते... हृदय से।
उत्स जीवन का लिए, हर स्थिति में।
जय प्रकाश मिश्र
पग तीन:
जीवन क्या है?
जिसने जीया! पूछा...उससे
चुप बैठा वो,
ताक रहा था उँजियारे को,
आस लगाए..
अंधेरे... घेरे थे उसको,
दाएं-बाएं.. ऊपर-नीचे..,
उचक-उचक कर
चिंगारी से खेल रहा था
फिक्र कहां थी,
आग शांत होती भी होगी,
अरे कभी इस अंगारे की।
भाव: जबतक जान और जवानी और ताकत होती है, तब तक तब पता ही नहीं होता कि कभी यह विदाई भी लेगी।
जीवन क्या है?
पूछ रहा हूँ, उन्जियारे से
एक लड़ाई लड़ी जा रही
अंधियारे से, झुक कर बोला
पर धीमे बोला।
अंधेरे से पूछा मैने
जीवन क्या है!
बोला.. मुझसे....
मुझसे... क्यों, सूरज से.. पूछो
क्यों काबिज है घर पर मेरे
आदि काल से।
जीवन का तो केंद्र यही है
मेरी लड़ाई इससे ही है।
भाव: संसार में सारी लड़ाई और संघर्ष केवल विचारों की असमानता और विपरीत अमौलिक, नकली मान्यताओं के कारण विपरीत गुणों के कारण लड़ी जा रही है।
जय प्रकाश मिश्र
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