किताब थी ये जिंदगी..

भाव: आदमी और उसका जीवन क्या है, अतीत का गट्ठर और कल्पनाओं के रंग का संसार, वर्तमान तो रुकता ही नहीं रेशम सा फिसल जाता है हाथों से और हम उन्हीं में घुल कर जीते रहते हैं। अपने को देखे इनमें कहां है

किताब थी ये जिंदगी.. पन्ने जुड़े हजार...

जुड़ते रहे हररोज एक, 

भीतर छुपाए राज..

जिस जिस गली से गुजरा, 

सबके प्रिंट बन गए....

रंगीन थे कोई, 

कोई बिंदास, कुछ उदास 

मैं घुल गया, उन्हीं में 

खुद को खोजता हूं आज

मैं वो, बन गया किताब।

पग दो: 

भाव: हम अपने लोगों और विरोधियों की छोटी छोटी बातों पर उलझ कर जीवन को कष्टसाध्य कर लेते हैं जबकि हमारे अस्तित्व के लिए प्रकृति जो मूक है इसलिए मौन की भाषा में कितना चीखती है, हम उसे अनसुना करते रहते हैं इनपर कुछ पंक्तियां पढ़े और आनंद लें, बन पड़े तो कुछ करें भी। 

"वो" दीवारों के पार से आते 

हर आदमी के स्वर- अक्षर, 

हर चाल, चाल में घुली 

बदलती, नजाकत 

हवाओं के पर 

गिनता रहा, 

ध्यान से सुनता रहा, 

रातों में अंधेरों में जगता रहा।

इतना ही क्यों जवाब सवाल करता, 

कितना, बखेड़ा भी खड़ा करता रहा।


लेकिन 

प्रकृति, के मुंह से, निकलती, 

ये चीख...! 

आंधी के भयानक स्वर..! 

बदलते मौसम की बेरुखी की आवाज! 

टूटते, दरकते पहाड़ों के आर्तनाद!  

रेगिस्तानी सूखे गले की पुकार!  

सूखती नदियां, पिघलते ग्लेशियर, 

मिटते पोखरे, बन, बाग, 

रसातल को जाता अधःजल 

कितना कुछ, हर बार 

अनसुना करता रहा, 

वो अनसुना करता रहा,

अपने आप को जाने न क्या, 

आज तक समझता रहा।


आवाज दे, देकर थक गई वो; 

अब विकल्प क्या होगा? 

उसके, पास, 

कुछ तो सोचें, मूक है वो, 

मौन उसकी भाषा! 

आप के लिए,

आपकी गलतियों की भीषणता…के लिए

उसका रास्ता क्या होगा ...

अब नहीं सहा… जाता… उससे।

अपने भीतर का ये गुबार! ..ये जलन…! 

ये बढ़ता असंतुलन! 

अब वह पिघलती है…

बहती है.. चट्टानों से बाहर निकलती है..

समेटती है, छोड़ अपनी प्रकृति

आगे बढ़ती है।

दूर अपने बच्चों से 

बहुत दूर.. बर्फ के मैदानों से 

अंधी ही सही दुख पहन निकलती है। 

बुझाने के लिए, 

अपनी भीतरी आग, 

तेरे भविष्य को समेटती है अब।

पर वो अंधी है रे!

क्या तूं नहीं जानता!

हम जैसे आंख वालों को जन्म देकर भी

यह प्रकृति मां, आज भी अंधी है रे! 

उसकी आंखे तो हमीं सब हैं

वह तो आज तक वैसे ही अंधी है रे!

तेरे प्रेम में, तेरे भले के लिए

इस अंधेपन में रातों दिन भरमती है वो।

हां मैंने देखा है, 

इस अपने अंधेपन की वजह से ही,

आज भी, जब मैं, घर जाता हूं,

तो हर बार, आंखे बंद कर 

अपनी बूढ़े हाथो की, 

कांपती उंगलियों से 

मेरा मुंह, कितनी बार

कितने! प्यार से! 

टटोलती है, छूती है वो।

एक मां से ज्यादा बड़ी

यह प्रकृति अपनी मां ही है रे! 

उसकी चित्कार अब तो कोई सुन!

जय प्रकाश

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