पावन अपावन भूल जाओ।
भाव: अपने जीवन में हम अपने अहम की या अपने पहचान की एक अजीब सी चादर या अनावश्यक उबाऊ धुंध लपेटे रहते हैं और उसी की रक्षा के लिए जीवन पर्यंत परेशान भी रहते हैं। अपने चित्त और मन की शांति के लिए कभी कभी इससे मुक्त हो अपने निसर्ग अर्थात अपने मूल के साथ इस पूरी चादर को हटा के अकेले में बैठना चाहिए। इसी पर कुछ लाइने पढ़ें और मजे लें।
चादर तो ओढ ली तूने
इतनी... बड़ी, फैली... इतनी,
कितनी.. गहरी,
उतार.. इसे एक बार, कभी फुर्सत.. में,
छोड़ मोह कभी, इसका
लौट आ, अपने में।
गंदगी है दुनियां यह!
मत घोल इसे अपने में
बैठ, सुस्थिर हो के कहीं, कुछ पल
बैठने दे, नीचे.. इसे, तलछटों में
जमने दे, अपने से...।
निथरने दे, इसका गंदलापन
हटने दे,
पानी तो साफ होने दे
कभी! लौट तूं भी तो पास अपने,
जागते न ही सही, सपने में।
भोग सारी दुनियां
तूं, रोक मत अपने को..
पर कभी तो बहने दे, दूर इसे,
अपनी, यादों के मटकों से...
बाहर तो निकलने दे,
कुछ कह लेने दे
चित में न धर कुछ, इसका
अरे? इसे मुक्त पत्ते सा
आती जाती हवा के संग हिलने दे।
छोड़ जग जंजाल सारा
कभी! इसे....
झरने सा कल कल बहने दे।
समय छुपता नहीं,
खत्म भी नहीं होता
छुप छुप के अंतरों में
अपने ही,
यादें बन बन ज़मा होता रहता।
कदमों के निशान
पुख्ता बनाता, आगे बढ़ता..
साल दर साल
एक वलय बनाता
हर तने में,
हर पेड़ों में, अलग रंग देता,
उसे सालों-साल जवां रखता।
जीवन समय है, समय नद है
काल है, पर बंधन नहीं है,
एक समन्वयक है, मात्र यह
निस्पृह, निष्ठुर सबसे अलग है।
आधार है, अवसर प्रदाता,
परम शिव है,
मिला देता है तुम्हारे पूर्व से,
तुम्हारे आज को, कुछ इस तरह
संभाल लेता है, छुप छुपाके,
आपको, आप...
खेल पाओ, वृत्तियों का संग लेकर
विश्व में इस, शक्ति भर
तुम शक्ति के संग, तैर कर।
छोड़ दो तुम कर्म सारे,
प्राप्तियां, परिणाम
पावन संग अपावन, भूल जाओ
हर मनदशा को बिसर जाओ
समा जाओ, आओ मुझमें
विराटता के राज्य में इस
बैठ जाओ।
मन और मेरे बीच छुपा यह कौन है?
क्या बुद्धि है, या सूक्ष्म कोई और है।
जन्म जन्म का संचित भाव लिए
यह कौन है!
जय प्रकाश मिश्र
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