वक़्त भी क्या चीज है!
वक़्त भी क्या चीज है!
घूमता है लाद कर,
जाने न कितनी लादियां.
हर आदमी... के
सिर के ऊपर!
किसको कहूं क्या!
अपना भी तो एक वक्त था!
भार था एक सीट का!
मुझ पर लदा था
परेशान था, कितना कहूं!
ले चल रहा था भार
सारे धरा का, मैं ही अकेला
मुझको लग रहा था।
फिर वक्त आया
भार आया और थोड़ा
उसी ऊपर, मेरी फैमिली का।
बढ़ता गया बच्चों से जुड़कर
और मैं दबता गया
पर वीर था मैं,
झुक गया हूं,
टूटा नहीं हूं, आजतक!
अब क्या कहूं! यह वक्त है
दो बांह की, मेरी बंहोंरी
इस शर्ट की
स्वेटरों की, कोट की, भारी हुई है,
आज मुझ पर।
किस तरह, अब क्या कहूं..
तुम सोच सकते ही नहीं,
यह दर्द मेरा, हाल मेरा!
इन हड्डियों का भार है!
इनको उठाना काम है!
उठाना.. इस हाथ को
गिराना.. नीचे मुझे
मेरे लिए,
काफी बड़ा यह काम है।
बीमार को जैसे उठाते हो कभी
कुछ उस तरह का हाल है।
मैं सच कहूं!
थक गया हूं उम्र से
उम्र की, इन गिनतियों के, भार से
चढ़ रहीं, हर साल, ही क्यों
हर महीने,
हर एक दिन, सीने पे मेरे।
वक़्त है, फिर जाएगा,
मै उड़... सकूंगा,
कोई कबूतर फिर बनूंगा
वक़्त की इस डाल पर
फिर बैठ कर
मैं तुझे ले साथ
फिर, से! तब कभी!
गुटर-गूं करता हुआ..
भार तेरा सह सकूंगा।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: समय के साथ सामर्थ्य का ग्राफ ऊपर उठता हुआ फिर नीचे आधार को स्पर्श करता ही है। हम पुनः निर्भरता के धरातल पर आ ही जाते हैं। और अति सामान्य काम भी तब दुष्कर बन जाता है। इसलिए समय रहते अच्छा जरूर करना चाहिए जिससे पछताना न रहे।
पग दो: जिंदगी
एक किताब थी ये जिंदगी
खुलती चली गई।
हवाएं साथ थीं
जब तक मेरे
उड़ती चली गई।
अब थमा है वक़्त…
थोड़ी हवा, थोड़ी जिंदगी..
देखता हूँ, निकल बाहर काम से
अरे! यह क्या!
इतनी जल्दी दिन ढला
और शाम हो गई!
उसने बताया पास से
वो देख ऊपर.. रखी हुई...
जिंदगी थी!
है नहीं!
जिल्दों में भर गई।
जय प्रकाश मिश्र
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