हे.निर्मले! पाषाण की बेटी, तरल,सहजा बता तूं!

मैं पूछ बैठा, एक दिन, 

मां पार्वती से,

मेरे.. शिव! कहां हैं? 

जटाधारी, पापहारी, पिता सबके…।

हे... निर्मले! 

भाव: परमात्मा से साक्षात्कार सबकी कामना होती है मां जगदम्बा से अधिक उदार कौन होगा जो उनसे मिला सके यही प्रार्थना की गई है।

पाषाण की बेटी, 

तरल, सहजा बता तूं!  

इस धरा पर, 

खोजता हूं, नद, नदी, वन, 

थान, हर शमशान

क्रमशः बुद्धि से, मन से, दृगो से 

विफल हूं, विकल हूं, संतप्त हूं

बीते दिनों से ही नहीं, 

जाने न कितने जन्म में।

भाव: मानव अनादि काल से इष्ट से मुखातिब होना चाहता है और अन्यान्य जतन तप, व्रत, दान सब करता आ रहा है। मन, विचार, बुद्धि सब इसमें लगा दिया है।

हे स्नात दुग्धा! 

हे विमल रूपा!  

हिम शिखर से झांककर 

स्वप्न के, चंद्रिल महल से 

निकल कर

वातायनो को पार कर! 

कृपा तो कर! 

एक बार फिर से, 

देख तो, 

हर को हेर... तो

बोल तो, क्या शिव वहां हैं?  

भाव: प्रभु की कृपा का मार्ग, मां की शरण और आत्मसमर्पण ही है। मां भवानी कैलाश पर हिम मंडित विशुद्ध स्थान पर निवास करतीं हैं। उनसे विनीत होकर प्रार्थना की गई है। 

पूछती हो कौन हैं?  

वह देव!  

प्रतिज्ञा, जिनकी लिए, बैठी हृदय में, 

बालपन से 

तूं कठिन, मैं जानता हूँ,

देवों के देव, 

उन काम शासक, 

महादेव! 

का सदा, आभास, 

तेरे हृदय बसता, जानता हूं।

घूमते जो, भस्म पोते 

अंग में शमशान की,

निशि-दिवस... 

जो रमण करते 

रेति पर, इस धरा की...

गंग को सिर पर लिए.. जो घूमते हैं..

परम शिव, शिव.. तो वही हैं।

भाव: ईश्वर एक ही है। हम अलग अलग लोग अलग अलग नेत्रों से उन्हें अनेक रूपों में ध्याते हैं। विभिन्न रूपों में उनकी स्तुति अलग अलग समाज और स्थानों पर की जाती है।

भक्त के हृदयों... पे रख कर चरण.. 

चलते काल के संग।

हरित सारी पत्तियां हैं केश जिनकी 

इस धरा पर..  

लहलहाती, नृत्य करतीं 

भूमि के हर भाग में।

धूसरित, धूमिल, 

लपेटे भस्म, सारी देह में, 

ताम्रवर्णी चमक को धारण किए

जो विचरते है 

शुभ्र वर्णी, साधुता फल.. हाथ में ले..

वही तो वह.. परम शिव हैं, 

आदि शिव हैं, अनादि शिव हैं, 

इष्ट मेरे।

जटाधारी, पापहारी, पिता सबके…।

जय प्रकाश मिश्र

पग दो

रस सब अन्तर्रस भए,

देखि अधर रस राजि।

दीठि सकुचि पुनि थिर भई ,

प्रकृति बैठि पद लागि।

जुगल मेलि इक रंग भए,

विस्मित बुधि जड़ लागि।

सहज ज्ञान समुझत सकल,

जगत गयो भरमाई।

जय प्रकाश मिश्र

अर्थ: समस्त आनंद श्रीहरि के अधर के सौंदर्य की मिठास के आगे नतमस्तक हो गए फीके लगते हैं।हरि का रूप इतना सुंदर है कि दृष्टि सकुचा कर उन पर रुकती ही नहीं, सारी शक्तियों और सिद्धियां उनके पैरों में तृप्ति पाती हैं। शिवशक्ति एक में लय संविलय होते रहते हैं वहां साधारण बुद्धि चक्कर खा जाती है। उन प्रभु के सामने जग विस्मृत हो जाता है।

Comments

Popular posts from this blog

मेरी, छोटी… सी, बेटी बड़ी हो गई.. जब वो.. पर्दे से

पेंशन बिन जिंदगी, मेरी ये खाली हो गई है।

चलो पेरिस की एक शाम से मिलें!