सजती जहां यह मुकुराहट, अमरित वहीं है

भाव: मानव जीवन ने अपनी उत्सुकता और उमंग को शाश्वत बनाए रखने के लिए, जादुई पृष्ठभूमि वाली कुछ चीजें कल्पना कर रखीं हैं। जिससे उसे पाने की लालसा हमेशा बनी रहे। अमृत, भी उन्हीं में से एक है। अमृत जीवन का ही द्रव्य रूप है। शास्त्रों में यह हमारे भीतर ही है और स्वांस की अनूठी सतत क्रिया से प्राप्य भी है। योगी इसी से जीवन का आनंद, सुघड़ काया और सुदीर्घ जीवन पाते हैं। यह कहां है, कैसे मिलेगा, इसकी सच्चाई को समेटती एक रचना प्रस्तुत है। आगे पढ़ें...

मानव है तूं! 

सब... जानता है!

तो बता, अमरित कहां है!  

पूछ बैठा,

साख पर, बैठा परिंदा,  एक दिन! 

मैं क्या कहूं? 

पुस्तकों में, था पढ़ा, 

देखा नहीं था आजतक.... 

अमृत कभी, पास से, इसलिए 

घबरा गया, 

पूछे, अचानक, प्रश्न से, 

चकरा गया।


फिर कहा, धीमे से मैने,

पास आ! सुन दास्तां अमृत की तूं… 

अब मन लगा के मित्र मेरे, 

ले सच ही सुन! अब मुंह से मेरे।

शांति से वह बैठकर, सुनने लगा

कहने लगा मैं…


है जहां जीवन पनपता!  

ध्यान दे? 

धार पाता, मचलता, 

खिलखिलाता, दिल से हंसता, 

कोर पर, उस छोर पर 

मुस्कुराहट मात्र, बस, सजती जहां पर, 

जिस होठ पर

अमृत मिलेगा, मित्र तुमको..

क्या चखेगा?  बोल मुझको। 

हंस के बोला, तो चखा दे! 


मैने कहा: मानव हूं मैं… 

पुत्र.. हूं अमृत का ही मैं..,

इसलिए तूं बैठ, 

कर तूं पैठ.. थोड़ा और गहरे..।

ध्यान से सुन दास्तां.. 

यह, इससे अलग…है :-

एक जगह है, दिल में.. तेरे, 

खोल उसको, 

ध्यान से, तूं, देख उसको..

गंभीरता से, प्यार से! 

आनंद की यह चाह 

जो तुझको जगी है आज 

उसकी प्रेरणा है। 

आग तुझमें यह लगी है.. जिस जगह

अमृत तेरा है उस जगह, 

तूं चख उसे।


पर, परिंदा, आम.. न था 

खास था..

इसलिए हो बेझिझक, बोला वो मुझसे

अमृत चखा, मुझे जीभ से? 

क्या करूं, 

किस तरह आगे बढ़ूं यह सोचकर

मैने कहा, तूं पास आ

देख, तूं इस साख को! 

सूखी हुई है? 

पर जुड़ी है पेड़ से, इसलिए 

थोडी हरी है! 

सैप* इसमें बह रहा है किस जगह से    (पेड़ में बहने वाला जीवन रस) 

रस वहीं है, अमृत वहीं है

तूं देख उसको।

मुस्कुराया, वो गजब से।

बस की तेरे बात ना है? 

सच बता अमृत कहां है! 

मैने कहा: 

अच्छा तो सुन, 

थोड़ा मन में गुन! 

नव कोंपले.. देखी हैं तूने

खिलती जहां से, 

उस जगह को, देखी है तूने 

नव कोपलों के अग्र पर 

नर्मी लिए 

जो स्निग्ध सा 

चमकता स्थान है 

अमृत है सारे इन जगह पर।

ध्यान दे! 

इसलिए जीवन है इनमें

हरीतिमा है, प्राण है

वही प्राण तुममें

हर स्वांस में

भीतर से बाहर देख कैसे बह रहा है

ध्यान दे 

इस स्वांस पर

स्वांस के स्थान पर

सम कहां पर हो रहा है

अमृत वहीं पर बस रहा है

आ पास आ, तूं आज मेरे 

साथ मेरे, अमृत को चख

बात अपनी बंद कर।

जय प्रकाश मिश्र





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