चल छोड़ यारा! आज हम एक खत लिखेंगे

नोट: पढ़ने से पहले बूढों को ताकीद की जाती है कि पानी में भीगना और ठंड में बाहर निकलना मना है। आप पढ़ें और आनंद लें, पर सभी के लिए जरूरी है कि जिंदगी में जिंदगी के साथ रहें, झूमे गाएं खुशी मनाएं बेशक वे उम्र में कहीं हों।

चल छोड़ यारा 

आज हम एक खत लिखेंगे

लिखते, थे जैसे बहुत पहले, 

बचपने में,

एक दूसरे को, 

चिट कटे से कागजों पे, 

पेंसिलों से,

फेंकते थे, बांध कर 

किसी फूल में, दूर से

देख तुमको रास्तों पे..

रख छोड़ते थे, प्यार से 

तेरे... उस फटे से बैग में।


बाग में, उस..., 

बैठ कर.. कुछ उस... तरह, 

इन बेचैनियों के बीच भी, 

इन्हें छोड़कर जड़ मूल से

उत्साह भरकर फिर वही, 

आ चल! 

तुझको, प्यार का 

ठीक वैसा... खत लिखेंगे...।


देख लेना बाद में, 

डूबना.. तुम याद में..

सिसकियां पर ले के... पढ़ना, 

तुमको कसम है!  प्यार में।


तूं वहीं..., और 

मैं बही...  अरे अभी!  

बदला है क्या, 

हर धुंधलका धुल गया है, 

साफ है अब..

घेर मेरी! तेरे तक.. थी 

आम है अब ....।


सच है तेरी बात,

तब के, कम, बचे हैं साथ

फिर भी क्या.. हुआ

हाथों में तेरा हाथ.. ये क्या कम बचा है..

दिन भी कितने ही गए हैं 

सोच तो..,  चल... आ,

चित्र अपना, वो पुराना, 

षोडशी सा

आज फिर से, खोज तो..एक बार

रख, उसे, मेरे सामने

मैं हाथ तेरा चूम लूंगा, आज फिर से।


तूं कपड़े वही, साड़ी वही, 

सजधज वही 

कर आज फिर से,

कर तो जरा, एक बार फिर से।

कह रहा हूं..।


आ देखते... हैं पुष्प.. पहला, 

कब लगा था, 

डाल में.. 

इस चित्र में, तेरे लला का 

तेरे ऊपर, भा गई थी, 

कितनी सुंदर लग रही थी.

कैसा लग रहा था, उस समय वह! 

देख तो..

कैसा दुलारा लग रहा था 

उस समय वह देख तो।


हम कितने पागल.. हो गए थे

सच उसी में खो.. गए थे।

तूं रो नहीं.. अरे! वो आएगा..

एक दिन मुझको नहीं, देखने

तेरे लिए वो आएगा...

अरे! कितनी दूर हो वो! 

मां को भुला क्या पाएगा।


तुझको कसम है, चुप हो अब!  

चल सहज हो जा, फिर से अब।

बाद में..

खेलते उसे देख कर, 

कभी हम अघाते थे नहीं

दूर कैसे हो गया वह 

इन तितलियों के जाल में

चल छोड़ सारा पास आ

अब नहीं मुझको रुला। 

जय प्रकाश मिश्र

पग दो. 

पग तीन: एक गहरी रचना है ध्यान से पढ़ें और भीतर जाएं।

कुछ किताबें थीं 

मेरे पास,

रखी करीने से

सटीं, मेज के पास।

इन्ही में से, एक को

उठाया, बड़े प्यार से इस बार! 

कहानी पढ़ने को, कोई शानदार! 

कंसंट्रेट हुआ ही था! 

तभी!  

परेशान हाल एक मां की 

आवाज मुखातिब हुई, 

बगल के कमरे से,

अपने क्षुधित बच्चों से, 

भरे दिल से, आज फिर, 

एकबार,

गए… रात अंधेरे, 

दिलासा देती, उसने कही….

फिर वही, पिछली बात!

सब्र कर! 

“रात काली, कितनी भी हो

बीत जाएगी, 

इंतजार कर! 

”वो” अंधा नहीं हो सकता

परीक्षा आज भी है अपनी

मेरे… बच्चों 

उसे धन्यवाद देते हुए 

तब भूख की बात कर।


सुबह होगी 

रात कितनी काली हो... बीतेगी

मैं सुनता… रहा,

बहुत.. सोचा! 

क्या इस काली अंधेरी रात के बाद! 

कभी कोई विशेष उजाला दिन 

इनके लिए आएगा

या ये रात ही सफेद हो जाएगी? 

जो अपने में, 

इनके बचे इस.. आखिरी सब्र को 

साथ बहा…ले जाएगी..

अंधेरा... कैसे हटता है 

ये बेचारे क्या जाने... 

पेट की आग के सिवा ये 

दूसरी आग ये, क्या जानें! 

सोचने लगा…

क्या कोई और दुर्वह, दुधर्ष सूरज 

इसी रात के अंधेरे से

यहीं से ही निकलेगा? 


ठीक है, 

मां ने दिलासा दी,

अभाव का आज.. संयम से बीते, 

जैसे, तैसे, पर कैसे!  

उम्मीद भी आखिर अकेले 

कितना खींचे..।

आज को कल, कैसे करे! 

खेद! 

सुबह तो हुई, ताज़ी गुनगुनी

पर! उम्मीद की रेखा! 

खींचने.... वाली

पेंसिल काली..  थी।

निसान तो उसी से बनते है, न! 

इस काली रेखा को ही तो पढ़ पढ़

सारे… साहब भी बनते हैं न! 

सफेद पर 

काली रेखाएं ही 

जिंदगी भर खींचते हैं न! 

किसी.. की, परेशान हाल की..

काली रात को सफेद करना चाहिए इन्हें

मोटी तनख्वाह इसीलिए मिलती है इन्हें।

सच कहूं! 

मेरी उम्मीद की आखिरी किरण 

काली साबित हुई।

आज देखा! बच्चों ने 

काली रात बीतने की बात छोड़ो 

दिन को भी अपनी करतूतों से 

काला कर लिया।

आज भी मैं काले ही अक्षर पढ़ता हूं

ऊपर की बातों को 

भीतर ही भीतर गुनता हूं।

तुम भी गुनो बन पड़े तो 

कुछ अच्छा करो। 

जय प्रकाश मिश्र

पद तीन: अब हंस दे भाई..

यार!  तुमको क्या बताऊं?  

क्या हुआ? 

मधुमक्खियों ने मृदु मधुर

जाल अपना, डाल कर, 

कलरात, घर पर मेरे कब्जा किया..।

रस मधुर था, मैं देखता था 

टपकता था छत्ते में वो

जीभ मेरे चढ़ रहा था।

एक दिन धुआं जलाया, तेरे जैसे 

एक मित्र ने...

काटती मधुमक्खियां, उड़ चलीं थी 

मधु को ले।

मैं बहुत हैरान था, करता भी क्या? 

जय प्रकाश मिश्र

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