धरती खिल जाती, चिड़ियां चहकती ऊपर,

वसंत पंचमी सरस्वती पूजा: 

खिलने लगे गुलाब क्यारी में, 
खेतो में राई मुसकाई। 
ओढ़े रंग बिरंगी चादर,
प्रकृति की देवी इतराई। 


मुकुलित तन प्रमुदित मन लेकर, 
सुंदर सुखद हवाएं आईं।
खुश हैं सारे खेत बाग, बन
मन में सुखद उमंगे छाईं।       

नाचे मन मयूर खेतों संग

ऐसी हरियाली छायी।

सरस हुआ तन, सरस हुआ मन 
सरस हुआ वन, घर आंगन
धानी चूनर पहन पहन कर
आज हुई है प्रकृति मगन मन।


सुंदर दिन शुभारंभ का,                      ज्ञान बुद्धि का
सताकर्मों के फल देने का,
देवी सरस्वती आईं।
पूजन करो, 
पीत पुष्प अर्पण करो, 
पीले वस्त्र धारण करो,
मां "वाणी" को नमन करो,
प्रसन्नता धारण करो,
ऊर्जित तन ऊर्जित मन हो
इस जग में प्रवेश करो।

जय प्रकाश मिश्र

चार लाइने हट के चौबारे से: 

बिंध जाता है.... हृदय पटल
जब नर्म कुटिल.... कांटों से
पीड़ा प्रिय..लगती है कितनी 
बिँध.. तीक्ष्ण नयन बाणों से।

जय प्रकाश मिश्र

आगे की अतुकान्त कविता का भाव: यादें या स्मृतियां भी क्या चीज हैं हमे वर्तमान की महकती फुलवारी से अतीत की शाम के गुमनाम गलियों में अपलक घुमा लातीं हैं। बदल देती हैं अन्तस और निष्ठुर अदृश्य बंधनों में बांधकर निबल कर देती हैं। दो शब्द इसी पर पढ़ आनंद लें।

ये यादें! 

क्यों बांध लेती हैं, ऐसे, 

अपना “मन”

बेबस, उतावला, परवश 

चंचल चित, कर देतीं हैं, 

तन से, बे-तन, 

पूरा, तन मन 

मन ही क्यों सारा, घर-आंगन।

डुबा लेतीं हैं, भीगा देती हैं 

अँसुअन बिच दोनो नयन, 

कर देती है परिवर्तन 

ये यादें! सुस्थिर 

जीवन।

क्यों बांध लेती हैं, ये यादें ऐसे “मन”।

आगे की कविता का भाव: अवगाहन, आत्मबोध और समझ पैदा करने के लिए या समृद्धि और अन्यान्य संप्राप्ति के लिए एकाग्रता और स्थिरता मूल आवश्यकता है। बिना इसके आत्मतत्व को आत्मसात करना हो या विविध संप्राप्तियां प्राप्त करनी हों, नहीं हो सकता। इन्हीं पर कुछ लाइने पढ़ें और आनंदित हो, अपनाएं भी।

बादल! तो आए बहुत, 

घिरते रहे, 

चंचल थे उनके पर, मगर

मचलतीं, नचतीं, हवाएं साथ थीं, 

अस्थिर करतीं…उनको 

क्षण प्रतिक्षण..।

घूमते, रहे वे, वे देखते रहे, 

बेमन..,

कहने को भी 

एकाग्र नहीं हुए एक भी क्षण

शायद इसलिए गरजे तो बहुत, 

लेकिन मोतियों की लड़ी… 

बूंद…बन 

नीचे एक भी बरसी ही नहीं.. ।


बसेरा बनाते, 

एक होते, रुकते, 

थमते, समसते, एकाग्र होते 

थोड़ी देर के लिए, 

उमस तो होती, बेशक

तभी तो पिघलते…, 

उनके उर से निकलते, 

भाव और भावनाएं 

और दे जाते..

जाते,.. जाते.. अपने 

सिरजे, शीतल 

जलबिंदु से मुक्ताकण,  

संग सब मिल कर बरसते 

ये प्यास मिट जाती,  

धरती खिल जाती, 

चिड़ियां चहकती ऊपर, 

सोंधी सी महक छा जाती 

धरती ऊपर।

जय प्रकाश मिश्र


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