अरे! उठो कोई आज तो!

भाव: आज का आम नागरिक और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग, सफल लोगों, और जिम्मेदार लोगों पर लिखी एक सम-सामयिक रचना प्रस्तुत है। मैंने कोशिश की है समाज की समस्या को रख पाऊं। आज हर सफल, हर जिम्मेदार स्वार्थी हो गया, और पढ़लिखा अपने में ही खो गया। गरीब गुरबा आमजन इन सभी के कारण ही आज हाशिए पर समस्याओं में दम तोड़ रहे है। कठिन शब्द के अर्थ अंत में दिए गए हैं।

मैं, देखता हूं.. हर सुबह, 

एक अजगर*..! 

क्या कहूं! बहुत लंबा, बहुत मोटा,

 लिपटा..हुआ, 

अनथका, कसता हुआ, 

हर एक क्षण, हर एक पल, हर सांस में, 

कुंडलित* होता..., कस रहा..

कम.. कर रहा है, घेर.. अपनी, 

सतत यह.. इस जानवर*.. पर।

हर तरफ.. से, लिपट.. कर,  

देखकर तो लग रहा है प्यार.. में.

पर वास्तविकता..! 

और है कुछ! 

रच रहा.. खडयंत्र* है यह... 

सदा से! 

*अजगर: चालाक, चतुर, शातिर, पढ़ें लिखे, बुद्धिजीवी लोगों का, नेताओं का, समाजसेवा का झूठा वादा करने वालों का, जिम्मेदारों का एक बहुत मजबूत संजाल जो लोगों को लगातार दंश दे रहा है, जीवन कठिन बना रहा है अपनी सुंदर चालों से।

*जानवर: निरीह, मूक, सहने को मजबूर, आश्रित जीवनधारी, अपने आम आदमी

*कुंडलित होता: वलय के व्यास को कम करना, घेरा भीतर की ओर कम करते जाना। 

*खडयंत्र: केवल शुद्ध हृदय वालों को छोड़ अन्य सभी ऊंचे लोग, प्रतिष्ठित लोग, संपन्न लोग सभी अपने को और ऊंचे बनाए रखने के लिए सदा अन्य निरीह लोगों को कैसे ठगें इसका प्रयत्न करते रहते हैं। शुद्ध हृदय वाले कम लोग हैं।

क्या मूक है ये? 

अभी तक, चीखा नहीं, 

सब देखता! सब जानता! 

क्या मूढ़ है यह! 

सोच ही सकता नहीं..! 

यह क्या करे? इनके लिए! 

यह अनपढ़ा है, चतुर शातिर भी नहीं है! 

बुद्धि सीमा न्यूनतम है, मानकर..

अजगरी * इस बुद्धिजीवी वर्ग पर.. 

आज तक विश्वास रख बैठा हुआ है;

कस गया है गले तक, 

सोचता है!  पर अलग, 

कुछ मिरैकिल गजब होगा

इस भाव को ले, जी रहा है, 

पर नहीं... यह सत्य.. है, 

हर एक क्षण.. , यह मर*.. रहा है।

*अजगरी: दिखने में अच्छी पर भीतर से भयावह दुख देने वाली चालें, आज के जिम्मेदार स्वार्थी लोगों की।

*मर रहा है: इसका जीना दूभर हो रहा है।

किस...की चिंता का विषय!  

यह आमजन है..

इक खेल है.. शतरंज* का.. 

जो हो रहा है... जाने कबसे.. 

आदि से.. 

हर खिलाड़ी.. पढ़लिखा हो

समाज सेवा.. का व्रती हो.. 

नेता.. महा हो, बाहुबलि.. हो

उद्योगपति.., व्यवसाई परम.. हो

सब बट* रहे हैं रस्सियां इसके लिए

हर एक युग से, 

बांधे रहें इसको सदा

निज बुद्धिबल और बाहुबल से..।

*शतरंज का खेल: जीत के लिए, स्वार्थ के लिए, सब कुछ छोड़ अपने कर्तव्य और अकर्तव्य का ध्यान न रखना, धूर्त हो जाना।

बंट रहे हैं: सतत तैयारी कर स्कीम बनाना, लोगों को प्यार से मूर्ख बनाना, पता न चले और अपनी चालों से किसी को लूट लेने की तैयारी।

बस, 

जीतने की तमन्ना में, 

सब लगे हैं,

कर रहे, हर काम, ये

बटोरने की, एषणा* में 

लूटने का, श्रम परिश्रम जो बचा है 

पास इसके मात्र अब! शेष है यह ।

*एषणा: कामनाएं, इच्छाएं, स्वार्थ पन, अपने लिए काम करना, आदि

हाय! क्यों देता विधाता 

बुद्धि, शक्ती और सौरभ *

कुटिल... कौशल! धारकों को...!

सोचकर मैं थक गया हूं, 

एक पत्थर* बन गया हूं।

*सौरभ: यश, कीर्ति, नाम और प्रसिद्धि

*पत्थर बन गया: संवेदना शून्य, हारा हुआ

एक मंडल, 

घेर कर उनको खड़ा है..

दूर से सब देखता, है ताक में,

छोड़ दे अजगर, जहां पर

तब निवाला वो बनाएं

इस जानवर.. निरीह को

आज इसको.. ।

 

कुछ इसलिए 

एक माडल, प्लास्टिक का ले खड़े हैं,

जल रही हो आग ज्यों, 

अजगर डरे... देख उसको दूर से..

ढीला करे, कुछ पकड़ अपनी

पकड़ कर ये, जानवर को

रास्ता अपने चलें।

जान अजगर की बचाते है सदा ये

जिंदा रहे वो बस 

इतना खिलाते हैं, सदा ये।


जानवर की… 

कौन सुनता है यहां… 

इन जंगलों में स्वार्थ के, 

भीड़ में, इस तंत्र के, संजाल में 

आवाज उसकी! दब गई है

हांफता है, वो निराशा से भरा है

क्या करे…!

तुम ही बताओ ?  

यह भी कृति* है विधाता की, 

क्या करे! घुट घुट मरे! 

समिधा बने हर एक युग में 

बस, युँ ही, जलता मरे! 

कुछ करो कोई!  आज तो! 

अरे!  उठो कोई आज तो।

जय प्रकाश मिश्र



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