किससे बजेगी उभरती उठती हुई, यह मधुर वीणा

भाव: अपने मन के अनुरूप, मन-चाहा योग्य साथी, सहयोगी या अनुरागी मिलने पर तन मन प्रसन्न हो जाता है। मन की सारी इच्छाएं पूर्ण सी लगती हैं। आनंद की पराकाष्ठा सी हम छूने लगते हैं। प्रिय स्पर्श और सानिध्य की चाह जो सपने होते है वास्तविक हो उठते हैं।

सौख्य.. 'सम' का 

जब.. मिले 

मन, निचुड़... जाता,

गहन.. अवचेतन के संग.. 

यह सुर.. मिलाता..

पेंग भरकर... टूटने तक..

तिमिर.. में भी मुस्कुराता।  


तुम.. मेरे मन के पथिक.. 

हो!  

पास.. आओ..

स्वप्न की दुनियां... सुरीली 

तुम.. सजाओ,

गिर रही, इस सांस के, 

अवशेष को

हाथ से अपने, थोड़ा तुम, 

थपथपाओ।

भाव: कुछ किरदार जिंदगी में ऐसे भी मिलते हैं जो हलचल पैदा कर देते हैं। उन्हें देख हम अलग दुनियां में तैरने लगते हैं और कल्पनाओं की सुरम्य वीथिका में पहुंच जाते हैं।

कौन.. थांभेगा?  

सजीली.. डोर इसकी,

कौन लेगा?  

यह, निमंत्रण! ..नेह का।

कौन लेगा.. सुख.. 

छलकती धूप का इस,

किससे बजेगी?  

उभरती, उठती हुई, 

यह मधुर वीणा सुरमिलाती 

तार की।

भाव: जीवन में कुछ लोग प्रेरणा के लिए मिलते हैं उनके लिए हम हमेशा अच्छा ही सोचते हैं। और उनके लिए शुभकामनाएं स्वतः स्फूर्त निकल पड़ती हैं कि यह किसी भाग्यवान के लिए ही बना है या बनी है।

सर, सरोवर संग 

सरिता.. डोलती.. यह,

बंध विह्वल, वक्ष, कटि 

संग अधर 

हैं सब डोलते 

पग विकल, पल पल अहा, कैसे! 

निर्झरी कोई झर रही हो

वाष्प कण भर चल रही हो..

है कहां विश्राम इसका सोचता हूं,

देवि है किस मन-मंदिर हाय यह! 

स्वप्न की दुनियां में.. मै तो तैरता हूं।

भाव: रूप और आचार दोनों मिलकर एक अद्भुत योग उपस्थित करते हैं जो लोगों को अभिभूत कर देते हैं। वे तन मन से उनका दरस पा ही खिल उठते हैं।और स्वप्निल कल्पनाओं के सागर में तरंगों की लहर पाते हैं।

जय प्रकाश मिश्र

शीर्षक: नारी की महत्ता

ठहरो!  
आवाहन अनंत के, 
मूक निनद!  प्राणों के...
मैं... अमर्त्य, 
शाश्वत.. निर्झर.. पीयूष मयी.. 
सरिता.. हूँ।
भाव: एक नारी ईश्वर को ललकार कर कहती है "रूप तुम्हारा, दिया हमारा" इसलिए ठहरो!  तुम नहीं, मै अमर्त्य हूँ, अमृत धारणी हूं, जग की शाश्वतता का बीज मै हूँ, मैं संसार के नदी रूपी प्रवाह का मूल हूँ। मैं रूप हूं, हर जीव को जीवन देती हूँ। मैं मां हूँ।

शुभे! सदा 

शिशु के स्वरूप में ईश्वर ही आते हैं,

महापुरुष की ही जननी 

प्रत्येक जननि होती है..

सोचो तो.. उस प्रसवपीड़ को

हर एक जननि

हर प्राणी को लेकर

वैसी ही... सहती है।

भाव: हर मां के लिए उसका बच्चा दुनियां का सबसे महत्वपूर्ण जीवन होता है वह उसे अपने ईश्वर के बराबर और वैसा ही अच्छा समझती है। विचारणीय है कि मां तो हर प्रसव के लिए एक सी ही पीड़ा सहती है बच्चा चाहे आगे जो भी अच्छा या बुरा बने।

नारी ही वह महासेतु 

जिसपर अदृश्य से चलकर,

नये मनुज नव प्राण.. दृश्य धर

जग में इस आते हैं।

भाव: यह विश्व माताओं की कृपा से ही शाश्वत बना हुआ है। सभी जन्म उसी से लेते हैं।

नारी ही वह कोष्ठ 

देव, दानव, मनुष्य सब छिपकर,

महाशून्य से निकल सदा 

सचराचर रूप पकड़ कर

आदि काल से आज यहां तक

रूप ग्रहण करता है।

सच!  यही विश्व बनता है।

भाव: मां ही वह मध्यस्थ माध्यम है जहां से देव, दनुज, मनुज, किन्नर, नर, बानर सभी पैदा होते हैं। पूरी सृष्टि का आधार आदि से आज तक, वह एक ही है। उसी से यह विश्व प्रचलित है।

जय प्रकाश मिश्र



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