तुरपाइयां... टूटीं कहां...मैं खोजता.. हूं

निकल.... पड़ते, शब्द.. है, 

मांद.. से,  मस्तिष्क.. के 

टकराहटों.. को देखकर

अन्याय के पदक्षेप से

टकराहटों के... बीच ही,

एक तिरमुहानी.. फूटती है

निकलती है हृदय से...

मैं, देखता, अनुभूति करता, सोचता हूं,

गुनगुनाता... घूमता हूं 

खुदी... में, साथ ही तो आप के।

भाव: लेखक या कवि जब भी कहीं टकराहट, टकराव या समाज में अन्याय युक्त बलप्रयोग की स्थिति देखता है, तो वह उसमें डूब जाता है अपने साथ उसे महसूस करता है। वह उसे बहुत भीतर तक अपने अस्तित्व में अनुभूत करता है।

हर एक रेशा... खोलता... हूं 

सब्र.. से

मैं.. बैठ कर, 

तुरपाइयां... टूटीं कहां... 

ये खोजता.. हूं

कहीं... कोई गड़बड़ी थी 

बुनावट... में, 

या रिश्ते घनेरे थे नहीं 

एक दूसरे से...

वा, सूत ही यह सड़ा... था, 

बेकार... था

यह क्यों हुआ, यह क्यों घटा, 

यह क्यों फटा!  

यह क्यों बिखरता घूमता है... 

इस तरह..., 

क्या ठीक से..., रखा नहीं.. 

प्यार से...

इसको... किसी ने।

या गिर गया है.. खुद लुढ़कता... 

आदतों से.. यहां नीचे.. इतने नीचे।

भाव: समाज में जो बिखराव, फ़टास, समस्याएं अशोभनीय जो कुछ वह देखता है उस पर वह विश्लेषण, मनन, गहन चिंतन करता है यह सब  चीजें कैसे और क्यों हो रही हैं। इनका कारण क्या है।

गहरे, नीचे...सोचता हूं,

बहुत गहरे..., दीर्घता से..., 

सूक्ष्मता से...

तब कहीं दो शब्द, भाई...

लिख, तुम्हें मैं भेजता हूं।

माफ़ करना, पढ़ते रहना शब्द मेरे।

भाव: इस प्रकार पूर्ण आत्मचिंतन कर तब वह अपने शब्द में उन्हें अपनी रचनाओं में संप्रेषित करता है।

जय प्रकाश मिश्र



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