कुछ तारे.. तेरे ही है ये..
पग: एक
क्या? कोई कोना,
रह गया है.. दबा अब भी,
यार मेरे...
ये... जिंदगी की सलवटें …
पीछे पड़ी.. हैं,
जाती नहीं क्यूं..!
रुकता नही है, दिल मेरा..
इन दीवटों पर..
अब क्या... बचा है,
लूटने को.. बाग में इस।
भाव: कभी कभी जीवन में किसी किसी के कोई कोई दबी इच्छाएं रह जाती हैं जो उसे चैन से रहने नहीं देती वह क्षिप्त-विक्षिप्त देखा जाता है जब की हर हरियाली की परिणति सूखे पत्तों में ही होती है यह बात हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।
पग: दो
तुम क्या करोगे.. यार,
मेरे खत को देख कर।
ये आईना हैं अब, मेरी
उस... गुज़री.. उम्र के।
भाव: सभी बड़े हों या बूढ़े उसी बचपने से गुजर कर बड़े होते हैं जहां आज एक बावला, नटखट किशोर खड़ा है।
पग: तीन
तेरे, मन में, क्या बसा है,
क्यों , इतना चुप है, … तूं?
मुस्कुरा, हंस... ले थोड़ा
बिछड़..... रहे है.. हम।
भाव: कुछ लोग जिंदगी को बहुत ज्यादा तरजीह दे देते हैं जब की यह खुश होने और आनंद के लिए है, चीजे इकठ्ठा करना और उनकी चिंता के लिए तो बिल्कुल नहीं इस लिए इसको इंजॉय करें। ज्यादा उधेड़बुन अच्छी नहीं।
पग: चार
ये, रंगीले… फूल,
झुकती डालियां... गजब,
कुहकती.., उछल रहीं हैं
हों.. उड़नपरी.. कोई
सरफिरे ये लोग, इनकी
चाहतें अज़ब..
दिन पूरे हो चुके हैं इनके,
क्या? जहां से अब!
भाव: बिलास की अति और आदतों का वाहियात हो जाना अंत की ही तैयारी होती है। सादगी और संयम ही जीवन है।
पग: पांच
ये उधेड़ बुन..
तुम्हारी देखता हूँ जब...
सोचता हूँ... किसलिए,
वो ब्रत... तुम्हारा था
संसार की सरिता... सभी
तुममे... समाती थीं
क्या हो रहा है?
नृत्य तेरा आदि रव ले अब।
भाव: एक अनुशासित बच्चा संकल्पवान हो व्रत लेकर पढ़ लिख आगे आता है पर जब समुचित सफलता नहीं पाती तो उसे जीवन के झंझावात हिला देते हैं। जो घर का प्यारा था सभी आदर सम्मान देते थे बदल जाते है और वह एक अजीब से आत्ममंथन से गुजरता है अपने से उसकी निर्मम मुलाकात होती है।
जय प्रकाश मिश्र
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