सोच से मैं अलग था सोच ही से मिल गया।

मुक्तक:1

कराहता उसे देख कर, 

दुआ मुंह से झर गई।

बैठा रहा,बड़ी देर तक 

क्या सच में वह,उस तक गई।

मुक्तक:  2

ये देख…. मेरी रूह, 

तेरी परछाइयों को देखती…. 

रेत के इन चमकते….. 

सिकता कणों पर

पांव रखती आ रही है,

प्यार से पानी पे चढ़ कर

कूदती है संग तेरे 

पवन में मिल

लहर पर इतरा रही है।

पास आ, 

एक बार तो अब

नदी ऊपर नाच लें हम

हवाओं को छोड़ नीचे

तारों तले अहसास का ही

एक घर बना लें,

प्रेम से,प्रेम में मिल 

प्रेम के इस राज्य में, 

इस निदग,आकाश में।

भाव: हम और हमारी चेतना दोनों जब एक लय एक सुरताल में हो जाते हैं तो हमारे कार्य और सोच दोनों बदल जाते हैं। यहां कल्पना और संप्राप्तियों का संसार अतिशय सुंदर और प्रेमपूर्ण हो जाता है।

मुक्तक:3

जो नहीं है पास तेरे 

खुद मिलेगा,पास आकर,

दूर तक,तब दीखता है,

खुद अंधेरे में रहो।


देख सकते हो उसे तुम

आड़ से जितना अधिक,

सामने वो है खड़ा यदि 

देख.... पाओगे नहीं।

भाव: सुविधाओं से कार्य संपन्न नहीं होता कार्य एकाग्रता और एकनिष्ठता से ही अच्छा होता है।

मुक्तक:4

खोजता हूं… 

उन तारिकाओं को…सभी

जो साथ थीं, मेरे अभी 

रात भर…अठखेल करती

आकाश में,इस उड़ रहीं..।

खिल रही थीं,जुड़ रहीं.

चमचमाती.. उभरतीं सी

लटकी हुईं नभ में टंकी थीं।

टिमटिमाती, स्फुरित होती, 

छुप्पम छुपाई खेलती थीं।

पास मेरे... 

आज कितना आ गईं थीं

भूमि तक इस,भूलकर, 

सच कह रहा हूं!

रात भर मेरे साथ ही थीं! 

भोर होते जाने कहां 

हैं खो गईं 

मैं खोजता हूं

सोचता हूं, क्या यहीं 

वे छुप गईं हैं पास में,.

निकल आएंगी अभी..।

भाव: जीवन में सफलता का एक सा दौर हमेशा नहीं बना रहता। जब सारे ग्रह नक्षत्र अनुकूल होते हैं तो अनचाहे इच्छाएं पूर्ण होती रहती हैं। आदमी वही, जगह वही पर चीजें बदल जाती हैं और लगता है अभी सब ठीक हो जायेगा। इसलिए शिखर पर जा कर संयम को अपनाना चाहिए जिससे उतरने पर खुशियां बनी रहे।

मुक्तक:5

चपल मछली सी  
उछलती जिंदगी!
करवटें किस ओर,
कब यह बदल लेगी,
कौन जाने?
भटका किए हम
साथ इसके 
दर-बदर, 
इस 
जिंदगी भर,आस लेकर.. 
फिर भी नहीं हैं, समझ पाए
पता इसका,
राज इसका आज भी 
इस उम्र तक। 

मुक्तक:6

जिस चांदी के 
चम्मच की तलाश में 
फिरते रहे तुम 
हर अंधेरे,उठ सबेरे 
रातदिन.. 
उजालों के पास तक 
बैठे नहीं..
वो पीछा नहीं है 
छोड़तीं,  
अमीर-जादो का कभी 
ये क्या करें।

मुक्तक: 7

एक लय 
नर्तन न देखा 
आज तक इनके सरिस
खो गया,सर्वस्व स्वाहा हो गया, 
मिल गया मैं राख में,जब 
देखता हूँ
अरे यह क्या!  
भभूति बनकर,इष्ट पर 
मैं चढ़ गया।
सोच से मैं अलग था
सोच ही से मिल गया।
जय प्रकाश मिश्र


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