शब्द है एक आदि का

प्रथम सोपान:

शब्द!  क्या... हैं? 

अकुलाहट...हैं  अपनी भीतरी* 

ये, मार्ग हैं! ये रास्ता... हैं, 

हम निकल सकें, 

वीभत्सता की अंदरूनी भाँस* से, 

किसी भी तरह, उस सड़न से, 

सड़ांध* से, 

जो उपजती है, 

विश्व के, व्यापार से,

अंतर में अपने, अन्तस में अपने रातदिन।


प्रतिकार तो हम, कर... सके..

आंतरिक.. 

उस विकल होते, बनते बिगड़ते 

प्राण के संजाल*से,

कैसे भी बाहर आ सके, 

हम आप* से...।

यह क्रियाफल* ही शब्द हैं।

द्वितीय सोपान: 

बरस जाए.. 

घेर कर ठिठकी* हुई 

"बदली"* ये, काली, उमसती 

जो, वेधती* है, रात भर मानस पटल को

बह सके बन नीर, भर भर, 

भाव सारे, तिर रहे जो, 

पीड़ा, प्रशंसा या अधिक कुछ और हों..

जो उपजते है, विश्व-बारिधि* बीच 

इस व्यापार में।

तृतीय सोपान: 

जो, हो रहा मंथन हमेशा आंतरिक... 

यह भेजता है, तीर* पर 

एक झाग* 

वह, उतरा* रहा है...

छोड़ता पीछा नहीं है, वही तो.., 

यह शब्द बन बन,

बाहर निकलता आ रहा है।

चतुर्थ सोपान

बह चलें ग़र, 

बे-समय ये... शब्द मुंह से,

बुदबुदाते बारिशों से, 

बरसें खुदी से...

सावनी बयार.. भरकर, मस्त होकर..

तब, और संज्ञा दिला देते, 

वाकपटु को शीघ्र ही, 

वे, ये शब्द, ही हैं।

पंचम सोपान

पूछते हो शब्द क्या हैं? 

शब्द हैं, वह.. रज्जु, 

जो बन.. श्रृंखला

बांधते हैं..स्नेह... ले, 

मानव हृदय को, 

मन मर्म को, 

मानस पटल को।

अक्षर से जुडी ये, मातृकाएं 

साथ लेकर, भावनाएं

स्पंद बन बन, उभरती हैं,

विचरती हैं, मन मंदिर में।

नवप्रात सी, ये निकलती हैं, कंठ से, 

प्रियतर सुरों को साथ ले..ले,

मधुगान करती, ध्वनि में लिपटती

खींचती है ध्यान सबका 

यह शब्द हैं।

षष्ठम सोपान

पर शब्द है एक 

आदि का... ओंकार..का 

यह शब्द, वह मह-शब्द है।

निकलता है सतत ही, 

इस नियति के कल-कंठ से, 

यह बिन रगड़ ही उपजता है

शांति के शीतल हृदय से, 

ऊर्ध्व मुख हो..

गूंजता है... 

योगियों के सदा मन में।

समाधि में.. यह... हम सभी के 

भाषता ओंकार बन भ्रूमध्य चक्रे।

1.भावार्थ: शरीर के भीतर भावनाओं का, विचारों का, संकल्प विकल्पों का एक प्राणिक संजाल हमेशा भरा रहता है। बहुत सी चीजें और निर्णय बहुत दिनों से अंदर ही रुकी है वह सब एक आंतरिक सड़न और सड़ांध पैदा करते हैं। हमारी फ्रेशनेस और प्रेजेंटनेस प्रभावित होती है इन लगातार रह जाने वाले विचारों से, इनको हम शब्दों के माध्यम से निकाल कर ही मुक्त और ताजा हो सकेंगे।

1. शब्दार्थ : 

भीतरी*: बाहरी सांसारिक कार्यकलापों से उत्पन्न आंतरिक ऊहापोह, वृत्तियां।                    भांस*: दलदल या अनिर्णय की स्थिति, किंकर्तव्यता की स्थिति।                      सड़ांध*: अवरुद्धता, कश्मकश, एक ही चीज का लगातार मनन, चिंता आदि।                   विकलता संजाल*: संसार के ताने बाने, सुख दुख, संबंध आदि।                                   आप से*: स्वयं से, अपने आप से।       क्रियाफल*: परिणति, परिणाम

2. भावार्थ: बाहर निकलते हमारे शब्द, हमारे आंतरिक विचारों के ऊहापोह, विभ्रम, तनाव और स्ट्रेस की काट हैं। जब हम उन्हें बोलकर, लिखकर व्यक्त कर लेते है तो हम शांत हो जाते हैं। विचारों की बदली जो हमेशा हमें अन्दर ही अंदर घेरे रहती है वह बरस जाए यानी शब्द बन कर बाहर निकले तो हम मुक्त और stress-free हो जाते हैं। यह शब्द की एक महान विशेषता है।

 2. शब्दार्थ 

ठिठकी हुई* : रुकी हुई, बाधित।              बदली *: इकठ्ठा हुई चीजें, आंतरिक असहजता.                                         बेधती* : लगातार परेशान करती.              विश्व बारिधि*: सांसारिक, दुनियां के संबंधों से पैदा हुआ

3. भावार्थ: जो विचारण हमारे भीतर लगातार चलता रहता है, समाधान के अभाव में व्यथित कर देता है, दुखी कर देता है वही तो बाहर निकलने के लिए शब्द का आश्रय लेकर उतावला होने पर या क्रोध में बाहर निकलता है।              3. शब्दार्थ।                                  तीर*:किनारे पर,मन के कोने में             झाग*: दुख, अवसाद।                            उतरा रहा*:परिलक्षित, दिखने लगता है          5. भावार्थ: यदि कोई, व्यक्ति बिना परिवेश का संज्ञान लिए, आवश्यक मानसिक फिल्टर के ही, मस्त हो जो मन में आए बही बोलने लगे तो उसे ये शब्द पागल की संज्ञा भी दिला देते हैं। 

6. भावार्थ: ओंकार वह शब्द है जो सदैव सर्वत्र एक समान संव्याप्त है। यह अविभाज्य है, सतत है, इसकी उत्पत्ति किसी रगड़, प्रवाह, गति, टकराहट से नहीं अपितु स्वतः अभिप्रेरित है। यह अनश्वर और सृष्टि सृजन से, आदि से पूर्व भी था और सदैव रहता है।

जय प्रकाश मिश्र




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