श्रीकृष्णराधे, कृष्णराधे कृष्णराधे
बांसुरी... बजती रही है..
आज पूरी...रात भर… ,
कसकती..., पीरा भरी,
याद में डूबी हुई, बहती.. रही।
श्री कृष्ण की, राधा कहां थीं?
"क्या सुन सकीं, ये पीर मन की"
श्रीकृष्ण के... ?
पूछ बैठा, पथिक प्रेमी..
एक कोई
राह चलता, एक दिन,
अलमस्त था..श्रीकृष्ण के ही प्रेम में।
श्री कृष्ण बोले…
अरे!
क्या वो... बांसुरी थी,
बांस.. की, राधा नहीं… थीं..
मेरे अधर-पट.. अधर.. रखे..रातभर!
कौन था! वह कंपकंपाते.. होठ लेकर,
पास मेरे, उष्णता भर, रात-भर।
अनुभूति... पा
जिन अधर.. की, मैं प्रेम में....
बहता रहा हूँ, पिघलता,
सरित बनता.. रातभर..स्पर्श सुख ले
आलक्त आभा,
स्वर्णमयि राधे चरन की गंग में स्नान करता
क्या राधे नहीं थीं, तो कौन था?
पर! फूंक... तो,
राधा की.. थी,
पहचानता… हूं,
उन्हीं… की परिशांत, तो वे धड़कने.. थीं
जानता हूँ!
नाद अनहद का लिए
वे बज रही थीं
सुनता रहा मैं, तैरता उनमें रहा हूं.. रातभर..।
बांसुरी कहीं, बज... रही थी
कसकती… पीड़ा भरी!
कंपकंपाते अधर हिलता... देखता
मैं चुप खड़ा था, पास उनके
रात्रिभर..।
पथिक सुन श्रीकृष्ण को,
श्रीकृष्ण में ही… खो गया,
श्रीकृष्णराधे.., कृष्णराधे… कहता हुआ
सुनता हुआ, वो प्रेम में, पगता… गया।
श्रीकृष्णराधे, कृष्णराधे
उसी दिन से हो गया।
जय जय श्री राधेकृष्ण।
जय प्रकाश मिश्र
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