शांति हो, परिशांति हो।

जाने न कितनी बार 

लेकर जन्म... 

मैं मिट्टी हुआ... हूँ,

मिट्टी में पुता..., सनता हुआ, 

रमता... रहा हूं।

"प्रेम मिट्टी से मिला" हर बार मुझको

जाने न कितनी बार मैं प्रेमिल... हुआ हूं

प्रेमी... बना हूं..

सच कह रहा हूं, 

जानता हूं.... मिट्टी है यह...! 

इस बार भी... यह जानता.. 

अच्छी तरह, से

देख तूं....

इस बार भी... 

फिर..

इसी में... मैं मिल रहा हूं।


मैं, अलग हूँ 

सर्वदा से..., मिट्टी... नहीं हूँ, 

जानता.. हूँ.. 

कौन मेरा... 

कुल... बताएगा मुझे..

मैं आदि-शिव.. हूं, अ-कुल.. हूँ,

कुल बनाता... फिर रहा हूँ, 

मिट्टियों में, 

क्या मैं यही हूँ? 

ध्यान से देखो मुझे, 

चिन्मयी से रूप लेकर...

आदि-शिव का प्राण भर कर...

सो-अहम की स्वांस पर चढ़ता हुआ

हंस-केली कर रहा हूँ...

आदि से... मैं उतरता... 

फिर.. चढ़ रहा हूँ। 

मिट्टियों में रूप लेता, 

गुण... में सनता

काल की इस पीठ पर मैं बैठकर  

नृत्य करता फिर रहा हूँ।


विश्व क्या है?  

रूप है? यह आकृति है? 

बन रही, टूटती, बिखर.. रही...है.

हर एक क्षण में किलकती, 

वायु का आधार.. लेकर

बोलती...डोलती, खोलती है राज, 

मेरा! (प्रकृति का)

खोजती मेरा बसेरा! 

और क्या है? 

भाव: विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को ही सदा से खोज रहा है। उसी की कार्य प्रणाली को समझने और अपने लिए: अनुपयुक्त करने में लगा हुआ है। यद्यपि यह सारा विश्व प्रतिक्षण स्वतः बनता और विनष्ट होता रहता है।

क्या खोजता.. तूं, फिर... रहा, 

मानव... यहां पर? 

आदि.. से लेकर यहां तक..

पूछता हूं (नेचर का प्रश्न)

आज तुमसे...,

क्या चाहिए तुमको बताओ

आज दे दूं...

पर लालची है, 

अभिशप्त है 

तूं, मूर्ख है

क्या कहूं...।

शांति, उत्सव, शील, संयम के बिना 

आनंद की, तूं खोज करता फिर रहा है।

भाव: बिना आंतरिक समझ, शांति और सद्गुणों के सारी प्रगति पर्याप्त कभी भी नहीं होगी। मनुष्य सुख और आनंद केवल बाहर की चीजों में ढूंढ रहा है पर यह बिना अपनी आत्म उन्नति के पूरा नहीं होगा।

कौन है, 

जो कटा जड़ से    (अस्तित्व हीन)

जानती हूं... 

काल पर तूं... राज करना 

चाहता... है, जानती हूं

जो है नहीं, 

कल्पना है मानसिक

मर रहा..   हर एक क्षण पर

उसी पर तो, बैठना तूं चाहता है।

भाव: समय या काल एक संकल्पना मात्र है, भौतिक रूप से इसका कोई अस्तित्व नहीं है, परिवर्तन और सापेक्षता या तुलना से ही इसे अनुभूत किया जा सकता है और उसी पर अधिकार की मानव चेष्टा पुराकाल से बनी हुई है। हम वर्तमान में रहना और जीना ही नहीं जानते।

तूं अकुल है, 

आदि है, चिरंतन है! निरंजन है! 

दूर उससे... रूप... का पीछा किए 

हर एक पल.. तूं भागता.. है।

सत्य को तूं छोड़ कर...

सत्य की ही... खोज, 

करना चाहता है।


तूं ही बता.. यह रूप.. क्या है

छाया ही तो है,... ढल रही..

आकृति जो बन रही...।

भाव: चीजे प्रकाश की उपस्थिति से ही नजर आती हैं। अंधेरे में छायाओं के विचलन के अभाव में जग का रूप और आकृति खत्म हो जाती है। संसार दृष्टि और प्रकाश का एक खेल ही है जिसके लिए हम व्याकुल हैं।

एक विचलन 

तल-वितल का 

रंग-छाया में बिंधा, 

चमकता हर पृष्ठ ऊपर, 

आकृति और रंग का यह, खेल.. ही है, 

क्या लिया.. और दिया... 

गिर रही इस किरण से.. आपने

जो बचा, वहीं तो है रंग तेरा

भाव: जो चीजें आप वापस करते हैं उसी से आपकी पहचान बनती है। आप धन बांटते हैं तो दानी, सोख लेते हैं तो कृपण कहे जाते हैं। ऐसे ही सभी वस्तुओं के रंग जो हमें दिखता ही वह भी होता है। 

पीछे पड़ा है इसी के 

उलझा पड़ा है इसी में..

जाने न कबसे.. क्या कहूं...

आंखे तेरी नवजात हैं, हर एक क्षण

तूं मान मेरी, 

कुछ नहीं है विश्व यह, तूं, मान मेरी,

आत्मता की दृष्टि से, 

तूं देख सबको।

भाव: मानव जन्म मृत्यु के पीछे अनादि से पड़ा हुआ है, जब की यह क्रिया हर स्वास और हर क्षण में होती रहती है। इसी मिट्टी से इसी सोने से सारे लोग और सारे गहने बार बार बनते रहे हैं। यह होगा ही होगा परिवर्तन या मृत्यु ही संसार है गति हीन विश्व मृत्यु ही होगा नवीनता ही नहीं होगी तो मस्तिष्क शून्य हो जाएगा और काम करना बंद कर देगा।

सच तेरे ही सामने है 

देख तो

क्या है बदला विश्व में.. तूं देख तो

वही मिट्टी आज भी है, 

वही मिट्टी कल भी थी

यही मिट्टी ही रहेगी सदा आगे

तूं भी यहीं था, वो भी यहीं था 

सब यहीं थे

सोच तो...

क्या!  कोई नया है!  नहीं तो

रूप, छाया बदलते है, 

किरण का 

सब खेल है,  यह रंग सारा

दीखता... फैला हुआ इस जगत में।

आत्मता तो... वही है.., अनादि है..

इसलिए तूं... शांत हो

शांत हो.. परिशांत हो।

आ यहां तूं पास मेरे 

यार तूं आत्मस्थ हो।

भाव: जीवन में शांति, संयम, स्थिरता, और सही समझ जरूरी है। 

जय प्रकाश मिश्र


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