तुम हो कहां! मै हूँ यहां!

वो खुली.. किताब था, 

सामने.. पड़ा... हुआ

वो ढूंढते..... उसे.. रहे 

दीवार-ओ-दर कहां कहां।


ऊखी मठों की केव में

पिरामिडों.. के क्षेत्र में

वो पढ़ रहे, अटक रहे, 

खोजते... सतत.. रहे।


जिंदगी... गुजार.. दी 

जिंदगी की खोज.. में

जिंदगी को साथ.. ले

जिंदगी की राह.. में।


वह भटकता रहा सदा

सोचता... कठिन... रहा 

जो उसी के सामने था

वो खोजता..उसे...रहा।

भाव: ईश्वर हों या उनके प्रतिरूप जैसे सत्य, सेवाधर्म या मौन यह हर जगह एक से सदा ही उपस्थित रहते हैं। फिर भी उनकी खोज में हम विशिष्ट होगा ईश्वर, अलग होगा ईश्वर, निरसौंदर्य होगा मान कर जीवन भर भटकते रहते हैं। और संशय में ही जीते हुए प्रयाण भी कर जाते हैं इसलिए हर रूप में हर किसी में उसे देखे और सच्चे विश्वास से अनुभव भी करें।

जय प्रकाश मिश्र

पद दो: आ घूमते है देश दुनियां

चार.. आँखें 

मिल.. गईं, यदि ठीक से,

तो, मान... लेना, 

बस गया संसार.... यह! 

बीच... उनके, 

आज ही से..।

भाव: सच्चा प्रेम फले फूले, परिवार बने, उसको सार्थकता मिले यह आकांक्षा है। लोग सच्चा प्रेम करें परिवेश वासनात्मक न हो प्रेम से परिपूर्ण रहे यह कामना की गई है।

सुंदर खतोना... 

एक दिन, बनकर रहे..

प्यार का...

सच! बीच इनके...

आ, प्रार्थना कर..इसलिए।

अनुपम, सलोना कोई सपना… 

पूर्ण हो….निर्मल हृदय का

संग इनका पुष्प दे, शुभ मधुर फल दे..

कामना कर! श्रेष्ठ है तूं! 

यह प्रार्थना कर।

भाव: हर श्रेष्ठ और सुधी जन से अपेक्षा होती है कि वह संसार में निर्मल हृदय और प्रेम के संबृद्धि के लिए कार्य और प्रार्थना करे। परिवार की संकल्पना सार्थक रूप ले संवृद्धि को प्राप्त हो। हर युगल अपना प्रेम पाए और स्नेहिल बातावरण बने।

आ बनाएं विश्व को इस…

सहज, सुंदर, सौम्य.. 

मिलजुल..

मूर्ति सा उस...

जो... बन रही है आदि से…

हर.. रूप में.. 

हर... आकृति में..। 

ढल रही हर... प्राण में, 

हर... स्वांस में, यह अनवरत…

गढ़ रही है, नियति इसको

अप्रतिम.. चिर-प्रतिम..हाथ अपने

युग युगों… से।

भाव: चेतना विकास का व्रत लिए यह समय चक्र सतत आगे बढ़ रहा है। हर वस्तु और प्राणी में लगातार अच्छाई की ओर परिवर्तन हो रहा है। मनुष्यता को और अच्छा करने में हम उसे सहयोग दें।

आग की ज्वाला थी यह 

कभी…लपलपाती… 

विप्लवी… 

पर, आज! देखो… 

तरल शीतल जल बनी… 

यह बह रही है , 

कठिन, उस, पाषाण सिर से

मोतियों से चमचमाते 

शुद्ध हीरक तुष कणों से।

भाव: प्रकृति भी अपनी संहारक शक्ति से विमुख हो कल्यानात्मक रूप क्रमशः ले रही है। हम भी उसका अनुकरण करें। उसका विशुद्ध जल और शीतल वायु हमारे लिए वरदान हैं।

आ 

मिलें, 

अच्छा करें कुछ! 

आज हम-तुम, जीवन जिएं…

मधुर हिलमिल, झरझराता झरने जैसा

शीतल सुखद, कुछ आस लेकर, 

स्वप्न लेकर, सद्वृति से

आगे बढ़ें, प्यार

बांटे... 

एक दूसरे में स्नेह से,आनंद से।

भाव: आइए सभी प्राणी एक मन हो एक लक्ष्य  "मानव की बेहतरी" के लिए आगे चलें। हमारा आपसी व्यवहार झरने सा सुखद शीतल और सौम्य हो। धर्म जाति से ऊपर उठ अच्छा मनुष्य पहले बने।

जय प्रकाश मिश्र

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