आज पहली बार.. ।
आज! पहली.. बार.., अब वह...पूर्ण थी
जीव-जीवन बीच का, वह सेतु... थी
मूल... थी, वह सृष्टि.. का
वरदान.. थी
मां.. बनी
थी
आज पहली बार
जब, वह! मां बनी थी।
भाव: पूर्णता क्या है? पूर्ण वह है जिसमें से पूर्ण ही निकला और वह पूर्ण ही बना रहा। इसी का प्रमाण मां है। वह संसार को स्वयं निर्मित करती है और संसार पालती और भोगती भी है। अतः जब वह संतति जनती है तो उसी के साथ पूर्ण हो जाती है। एक मां जीव और जीवन के बीच का सेतु है उसकी माध्यम है, सृष्टि के नवीकरण का दायित्व उसे संप्राप्त है। मां को नियति से वरदान मिला है इसको पालने और पैदा करने का।
'नित्य'...
उसके... सामने
झुक...कर... खड़ा था,
प्रेयसी थी.. आज तक, वह जीव की..,
एक, वैसा
जीव..! उसके
सामने..., अपना पड़ा था,
महिमामयी थी!
आज वह महिमामयी थी!
आज पहली बार..
जब, वह! मां..बनी थी।
भाव: नित्य क्या है! चलता हुआ अनवरत यह जीवन क्रम ही तो है। एक मां के सामने वही जीवन शिशुवत रूप में उससे ही जन्म पाता है। असहाय सा! उसके सामने जन्म के समय जीवन रक्षण की याचना करता है। जो अभी कल तक एक जीव या प्रेमी की प्रेयसी थी आज वैसे ही एक जीव की जन्मदात्री बन महिमावती हो जाती है। यह मां की विशिष्टता ही है।
मैं..
देखकर..
हैरान था! ये क्या.. हुआ था!
हाथ तो, वे ही थे, जो नित, देखता था,
चंपक उंगलियां वे हि थीं,
कितनी चपल थीं.. हाय कल तक..,
पर... अरी! कैसी..!
शांत, मरियम... अरु सु-कोमल...
अचानक, वो.. हो गई थीं ।
आज पहली बार....
जब, वह! मां.... बनी थी।
भाव: एक वय प्राप्त नारी या लड़की की सामान्यतः हाथ और उंगलियों में एक अलग चपलता और सौंदर्य होता है पर मां बनते ही वही उंगलियां कितनी शांत और संयत हो जाती हैं। मां मरियम के सारे गुण और कोमलता वह प्राप्त कर लेती है।
क्या छुपा था आज तक,
कैसे! कहां था!
सब निकल आया! यहां
बस एक दिन में!
वह हाथ लेकर पंख सा..
पंख से भी बहुत हल्की, हो गई थी।
आज पहली... बार
जब वह, मां... बनी थी।
भाव: एक बच्ची में ये अद्भुत मां के अपरिमित मधुर और सूखकर गुण कहां छुपे होते हैं जो मां बनते ही रुपायित हो जाते हैं। मैने देखा है उसके हाथ नाजुक शिशु के लिए चिड़ियों के कोमल हल्के पंख से भी मुलायम और हल्के हो जाते हैं। यह रूपांतरण जादुई है।
शक्ति थी
वह तड़ित थी!
गर्व थी, वह अग्नि थी
ये क्या हुआ! करुणामयी
वह, हाय इतना
आज... कैसे हो गई,
आज पहली... बार
जबसे, मां... बनी थी।
भाव: हर कन्या युवती होने तक भी शक्ति सी, बिजली की शक्ति धात्री, गर्व पूर्णा,अग्नि सरीखी होती है, लेकिन मातृत्व प्राप्त होते ही वह वत्सल और करुणा मूर्ति हो जाती है उसमें पालन की क्षमता आ जाती है। मातृत्व की कोमलता स्वतः स्फूर्त होती है ममता और राग वास्तविक प्रेम में प्रगट दिखता है।
जय प्रकाश मिश्र
Comments
Post a Comment