नर-बेलि का यह पुष्प सुंदर
वह पुष्प थी नर-बेलि के
उस पादपी का
मां.. है जो,
इस..
धरा पर..,
पर प्रकृति.. है,
रश्मयी निज सोच से है
रसमयी स्पर्श जिसका आदि से है।
भाव: लताओं में, बेलि में जैसे पुष्प खिलते हैं वैसे ही नर-बेलि रूप नारी भी है, इसमें शिशु रूपी पुष्प खिलता है और वह मां की गरिमा पा जाती है जो पुण्य का स्रोत और मधुरता, वात्सल्य की रसमयी धार हैं।
देखती, सुख स्वप्न वह, उस गर्भ में
घूमती यह विश्व सारा...
एक पग.. में,
नियति..
के..
उस जाल में, है आ फंसी..,
रूप का आधार..
इसको मिल..
गया है,
देख जैसे उर्वशी है, उर-वशी।
भाव: गर्भ में आत्मा के प्रवेश पूर्व आत्मा के लिए सारा विश्व उसके कदमों के नीचे होता है। सूक्ष्म आत्मा जो मुक्त थी पुनः धरती की गंध से आकर्षित हो गर्भस्थ हो जाती है और सुंदर रूप में पाशबद्ध हो जीवन को अपना लेती है
'फूले बताशे' लोग सारे हो रहे हैं,
उत्साह.. पग बूढ़े.. हुए थे,
भर.. रहे हैं;
संबंध..
की..
चादर लपेटे...,
मैं उमंगता.. जा रहा हूं
समय को आंखे दिखाते जा रहा हूं..,
नर-बेलि का यह पुष्प सुंदर
हृदय में रख,
पंख…
फैलाता हवा में जा रहा हूं।
भाव: नवशिशु के आगमन से सभी के मन प्रफुल्लित हो जाते हैं। लोग फूले नहीं समाते। आदमी अपनी वंश परंपरा से ही समय को जीत लेता है, और कल्पना की उत्तुंग उड़ाने भरता है।
जय प्रकाश मिश्र
पद द्वितीय:
वह पुष्प थी नरबेलि की
इस धरा पर
फनगती
स्पर्श
पा रसमाधुरी के हस्त का
खिलखिलाकर हंस पड़ी।
कुछ..
अटपटा.. सा
राग... पा, अपनेपने... का,
देख मुझको अनखिला...वो खिल गयी।
एक महक ले पैदा हुई थी जन्म से....
धरा का स्पर्श पा इस
देखते ही देखते
हवा में वो
बिखर
गई।
ए...क पादप नवल.. हो,
पर....मुखर हो!
कुछ..
इस तरह से किलकती
मां के हृदय पर
हृदय रख
वो
चिर-आदतन ही चिपक गई।
भाव: शिशुवत बच्चों की दूधिया, निर्मल हंसी मोह लेती है। हर प्राणी में एक विशिष्ट जन्मजात सुगंध होती है, जो वह ले कर पैदा होता है। आदमी का बच्चा सुंदर तो होता ही है साथ में मुखर भी होता है। पुष्प से यह अंतर विशेष है। जन्म जन्मांतर से आपत्ति काल में मां का शब्द मुंह से जीवन भर अनचाहे निकलता है, वैसे ही बच्चा भी मां के वक्ष में वास्तविक सुरक्षा अनुभव आदि काल से करता चला आ रहा है।
जय प्रकाश मिश्र
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