पूरा कर चुके थे, मकसद.वो अपना.बस अलविदा कहना था उनकी.
फुलझड़ी कविता शीर्षक: मौसम
कोई हमदम तो मिला
साथ चलने.. को मिला,
दूर तक.. न ही.. सही
बात करने.. को मिला।
चलो मौसम तो मिला,
यार.. कोई, तो.. मिला।
कौन कहता है.. उसे
यार.. वो, प्यारा.. नहीं
मुझे लगता है... सुनो
सबसे... प्यारा है वही
चलो कोई यार मिला
प्यार करने को मिला।
हाथ से.. छूता है मुझे
प्यार में.. कैसे..कहूं.
लाल हो जाते हैं चिबुक
लाल.. टमाटर.. हों पके।
सर्द.. मौसम है मिला,
यार है दिल का मिला।
कोई साथी तो मिला
चलो कहीं छांव तले।
सद्यः रचित
जय प्रकाश मिश्र
मुख्य कविता :
पूरा कर चुके थे, मकसद वो अपना!
उसका,
अपना... एक शौक... था
सिगरेट के टोटे,
कंडील के बचे.. हिस्से,
आखिर में बची, फेंकी हुई,
बेकार खाली,
माचिस की डिब्बी
फूल की सूखी, नीचे गिरी,
पंखुरी...
जली हुई, बची, छोटी,
फेंकी-तीली
बटोर... लेता था, बहुत संजीदा
होके, अपनत्व से भर के।
शाम होने पर,
बड़े ध्यान से.. प्यार से... एकांत में
गहरे....
उन्हें देखता, छूता ...
विभोर होता, अपनेपन से।
मनन करता, सोचता...
बैठ कर...
आराम से, अच्छे से..., हौले हौले...।
धन्यवाद... देता था, भीतर.. से,
थैंक्स... कहता था.. दिल से,
सबको बारी बारी,
एक.. एक.. करके।
आखिरी बार, उन्हें जीवन की
अंतिम मंजिल.., मिट्टी में
मिलाने से पहले..
जो सभी की एक ही होती है...।
वो, सोचता,
ये सभी.. अंतिम चरण में है..
अब अपने,
बिल्कुल उसी के जैसे..
अलग कहां हैं... उससे।
उसी की तरह..
ही तो थे, अलग कहां..
कैसे..
जो, पड़े थे अब,
यथार्थ की जमीं पर नीचे..
अपनी जिंदगी... का मकसद..
पूरा.. कर.. के।
छोड़ वो....
जवां फड़कता... पॉकेट-सिगरेटी
जगमग करती... क्रिसमस पर
भर रात जली यही..सुगंध,
और खुशी देती
बची मोमबत्ती!
महकते..
मंदिर में, प्रभु के पास, जगमग थाल
में रखी.यही वो..माचिस..,
चहकते बच्चों वाले घर..के,
गुलदान में लगी..
सुरभि बिखेरती, महफिल की
सजधज में हिलकती..
कलियों भरी गुलाब की ये सूखी पंखुरी।
अब सब खत्म,
मायूस...,
जीने को बची... ये गुमनाम जिंदगी..।
राह चलते...गिरते पड़ते..
जिनसे..
अब किसी को..
कोई भी मतलब न था..
वो पूरा कर चुके थे
अपना मकसद...
दूसरों को जिंदगी दे दे के,
खुश रख के।
अब उसे, उन्हें, अलविदा
बड़े सम्मान से, दिल से, कहना था।
उसकी जिंदगी का अब तो बचा
यही एक..
मकसद था।
बस इसलिए बटोर लेता था
सिगरेट के टोटे, कंडील के बचे.. हिस्से,
आखिर में बची, फेंकी हुई,
बेकार खाली, माचिस की डिब्बी
फूल की सूखी, नीचे गिरी, पंखुरी...
जली हुई, बची, छोटी, फेंकी-तीली
बटोर... लेता था, बहुत संजीदा
होके, अपनत्व से भरे।
जय प्रकाश मिश्र
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