वो लोक गीत, हृदय के गीत थे।
बरसती..... बूंदे,
महक.....
चंदन..... सी,
टपकतीं…माटी पर
फिज़ा-ए-रंगत....
बदल.. देतीं सी।
मैं...
क्या जानूं!
कैसे... कितनी
कस्तूरी ये, गुप-चुप...
अंग अंग.....
छुपाए.. फ़िरतीं.. सी।
बस,
महक उठती है.. ,
पूरी फिजा.., दिशा सारी ...,
बार.... पहली,
जब ये....
नशा-ए-आकाश..... से
धरा-ए-दिल .... पर
उतरतीं.... सी।
अपने... घर की,
बेटी... सी
शर्माकर झुकती..., झुकती...
धरती… मां, के चरन..
शीतल पलकों से...
छू लेती... सी।
ना… जाने,
कितने.... सिता..र!
बजने.... लगते, एक... साथ!
रागिनी... ले ले, के... मल्हार!
कौन.. गिने... ,
कतारें.. उनकी!
रिमझिम-रिमझिम, सुरसुर, सुरसुर,
सुर-सुराती,
हवाओं में मिल खनकती सी।
पुरुवाई..
मस्त पेड़ों से
अंगडाई... ले ले कर
अँधराये यौवन सी, मोड़ती डाली को
बेसुध हो हो के,
पेड़ों से भिड़ने लगती सी।
जाने... ना,
क्या... हो जाता है,
मन... को सबके, संग बूंदों... के,
चेतन तो छोड़,
अचेतन... हवा.... पेड़ों को
क्षणभंगुर.. यौवन पे
अख्तियार..ही, नहीं सी।
नाच, मन
मयूरी बन बन..,
वन.. वन..
इसी बीच.. तूं भी...
किलक, क्रैंकार..भी कर...!
हिला.... दे... इस जंगल को...,
हर दुलकते...ढुलमुल दिल को,
संग..ले ले.., इन बिजुरियों... को
कड़कती.... कठिन..
दामिनी.. सी चमकती ऊपर..
फ़नगती-फुनगियों के अंतर,
हिरणियों के कातर... तन-मन में
अंदर तक।
आज फिर.... भूलें... मुसाफिर!
रास्ता... अपना, सच्चा..,
एक... करदे, धरती-नदी
मन.. तन.. सब.. प्लावित.. कर दे..
इन घनघोर! बरसती... बहती..
हर... हर.. करती...
आज की
इस आकाश में जमीं
कजरारी, कारी बदलियों के..
नूतन अंगों से,
पय सी निकलती
विशुद्ध बरसातों से
एक बार फिर... भींग जाऊं...
प्रथम-पयस्विनी के पय
की सुमधुर...
मीठी... धारों से।
जय प्रकाश मिश्र
शब्दार्थ;
फिजा-ए-रंगत..... पूरा माहौल ही
कस्तूरि नाभों की...मृग नाभि की कस्तूरी
नशा-ए-आकाश... मतवाला आकाश
पुरुवाई.. पुरवा ठंडी हवा
कातर... भयग्रस्त, दुखी
पग दो:
चाहत?
अब भी.. बहुत है,
कभी... भीगता, भी था..
तर-ब-तर अंदर तलक,
संकोच मत कर,
हां हां! वहां, भीतर के भी भीतर तक!
अकेला न समझ!
तूं..
क्या जाने!
बूंद पड़ती है, ये.. जब!
नंगे बदन..!
बादल के संग! बदलियों के
अचानक घेर लेने.. से,
मिल... बरसने, खेलने से..,
घुमड़कर....
तड़-तड़, तड़, तडा-तड़,
और फिर देर तलक
बूंद..! बुंद बुंद.. कर! बुंदिया कर!
दिन भर.. बरसने से।
खुले मैदान.., खेतों धान..
में जब चल रही हो
पूंजा.. रोपाई, खर.. सोहाई।
या भर रहा हो पानी कोई..
खेत की मेडा बंधाई..सबमें
मजा आता है बहुत, सच कह रहा हूं
भीगने.. से, मौसम.. से, लोगों.. से
सोच मत!
मैं.. बिल्कुल अकेला ही रहा हूं।
जीवन को जीने में।
गदराई बालियों के बीच
रेंडे गोफ़रों के बीच.
हरस जाता था मेरा मन
पुलक जाता था मेरा तन।
झुरझुरी ले तान मीठा, गीत गाता
मचल जाता था मेरा मन।
दिल! उचक् जाता है, मेरा
कर याद
वो सब, आज..
प्रायः लवो तक छू हि जाता है
मेरा.. मन..
सुन सुन... गंवनई के गीत
उतरते... चढ़..रहे. संगीत
लय-बिध वे पिया के गीत..
बरसते! बदरिया संग
घुले माहौल के..वे गीत
कजरी आंख कोनों में समाए
कजरी मेलते वे गीत.
कई खेतों से आते...
अनुगूंजते..
मन हृदय में
लोक ध्वनि की, धुन जगाते।
सोचता हूं आज,
क्या वो गीत थे? बस!
नहीं वो गीत..से आगे
हृदय..... संगीत.... थे, सच।
जीवन के... दबे,
वे भाव थे
उद्गार थे, सच्चाई हि थे,
अंगार थे!
जो कभी.., वे कैसे कहते...
लाज के पहरे, हजार हजार थे..
इस लिए वे गीत बन बन बह रहे थे .....
लोक में ...
लोक मर्यादाओ को बचाने के लिए
जो, सारे किस्से
जीते जी ही चुन गए थे
लोक की दीवार में।
क्या
छुपा था, लोक में
जो उभरता था गीत में..
वो टीस थी! मन में बची वह टीस थी,
जो बह रही थी
गीत बन कर खुले में..।
उलाहने थे,
एक से.. ही हर किसी के
जो हर गले से निकल थे..
प्यार से..।
निजी संबंधों की कुछ दास्तां थी
दरारों में दबी दुर्गंध देती...
सने थे सास, ससुरी, और देवर...
सब उसी में
कारनामों एक से थे ..
प्रतिवेशी कहां इससे अलग थे.।
गीत वे माध्यम बने थे हर किसी के
बात कह कर प्रेम से
उसके हृदय से, शांत होके बैठते थे।
गांव के मुखिया
पे सुखिया बात अपनी
राय अपनी, कैसे कहे...
जो ये गीत न हों, तो आखिर
वो सब कैसे जिएं।
प्रिय के उलाहनो से भरे मधुर गीत
घिरी बदरी में, कजरी की
फ़नगती, सांसे
भरती
समवेती सुरीली उठान
ऊपर उठती, नीचे, गिरती बूंद
में भीगती देह
पानी में डूबे हाथ पैर, अंग सारे ..
मन में हुलास.. सब एक सपना
आज देख लेता हूं।
वो जिंदगी इन शब्दों में
पढ़ कर आज भी जी लेता हूं।
देखती थी.. कैसे ससुई बहू.. को
बहू.. कैसे देखती थी सास.. को
देखता था कैसे.. हाकिम अंग उसके
प्रिय था कैसे... परेशाँ हर चीज से..।
वो गीत थे वे, गरजते सिवान में
आधे इधर...
एक खेत से उठते हुए..
आधे उधर उस खेत से
पुरते हुए।
क्या सधी हुई तारतम्यता थी
कैसी चुलबुलाती हंसी
और पका अनथक यौवन था।
वो गीत क्या... अभिव्यंजना थे..
अशरार.. थे... सच्चे,
हृदय में रह गए थे
कंठ में, वे रुक गए थे
लाज के पर्दे में उलझे
निकल पाए थे नहीं..
वे, लोक मर्यादा के नीचे,
उभरते थे गीत में, उन गीत में,
सच कह रहा हूं। कभी तुम भी तो सुनो..।
बैरी रेलिया, पिया को लिए जाय रे!
घर नाही ननदी के भैया री दैय्या!
आदि आदि..
जय प्रकाश मिश्र
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