क्षणिकाएं

पद प्रथम: सलवटें जरूरी हैं..

रूप कैसे निखर कर 
आसाज़ होगा
धरातल तो चाहिए….
उसको कहीं
गर मैं नहीं तो रंगतें 
किसपर चढ़ेंगी
कौन उनकी सोच का 
आगाज़ होगा।

रंग सारे जो दिखेंगे 
गदरी हुई... 
इस पंखुरी.. में
क्या खिल.. सकेंगे..सलवटों... बिन 
बीच.. में, सूने लगेंगे, सोच.. लो
सपाट होंगे.. एक से.., 
भोथे... लगेंगे
अच्छे.. न लगेंगे, 
थोड़ा दबा सा.. रंग तुमको, चाहिए
परतों परत के... बीच में.. 
दिख... तो सको..
कुछ अलग उनसे..
इसलिए..
थोड़ी कशिश... तो चाहिए 
इस जिंदगी में।
सच कह.. रहा हूं, 
सुन मेरी..
कुछ सलवटें भी चाहिए 
स्मृति बनाने के लिए इस जिंदगी में
याद करने के लिए इस जिंदगी को।

पद द्वितीय: कौन चलाता है समय का पहिया

वक्त!  

इंतजार... 

करता रहा..! 

ठिठका रहा, बड़ी देर तक..

हिला ही नहीं।

आखिर! आगे  कैसे  वो बढ़ता।

किश्तियों ने, पालें अपनी, 

बांधे रखीं,..खोलीं...ही.नहीं, 

आगे कौन बढता ..., 

इंतजार होता रहा  ....

नदी बहुत.. नाराज़ थी, 

कोने में बैठी..रो रही, 

मजबूर थी,

चलने की खातिर, अन्यथा वह! 

रुक ही गई..थी, 

एक सच कहूं! बहने के लिए बस, 

मात्र ही, वह, बह रही थी, 

आखिर होता..भी क्या? 

दो शख्स तो थे, जो चुप चुप खड़े थे

पास तो बहुत थे, पर दूर थे, 

अलग थे इक दूसरे से

प्यार! उनमें 

"कहने को भी, था ही नहीं"।

अरे!  वो तो शुक्र करो!  

दो कबूतर निकले!   

मटियाले दड़बों से, अपने

वक्त के रहते.. 

गुटुरगु-गुटुरगूं प्यार से बोले! 

साथ ले प्यार की उस शक्ति का

समय का पहिया डोला, 

और फिर थोड़ी देर में हवाएं भी बहीं.. 

फिर तो चिड़िया चहकीं  

और शर्राती सरे आकाश उड़ी।

भाव: यह संसार प्रेम से ही गतिमान है, सारे जीवन प्रेम की ही परछाई हैं। धरती से जीवन चला जाय तो समय भी रुक ही जाएगा। प्रेम से ही गति है इसी सारी शक्ति समाहित है।

पद तृतीय: खो गया है प्यार अब तो..

प्यार तो एक.. खेल ही था

स्वभाव था, हर एक का तब 

खेलते थे.. बचपने में,

घूमते थे गांव में, 

चहुंओर.. लपेटे इसे 

एक संग मिलजुल हम सभी

खेत में खलिहान में.. स्कूल में मैदान में

शादी बरातों बीच 

लुक छिप, रात दिन, पहर कोई

एक भी खाली नहीं था..

दूल्हा दुल्हन की चादरों की ओट में

छुप्पम छुपाई खेलते!  

क्या दौड़ते थे..! 

क्या हुआ उस दौर को 

सोचो कहां वो खो गया है बीच अपने 

आज तो मिलता नहीं है।

लग रहा बच्चे सयाने हो गए।

भाव: एक समय था बच्चे बालपन से सराबोर थे आजकल तो बचपने में ही इतना बोझ बच्चों पर है कि सयाने लोगों की तरह व्यवहार करते हैं। स्वाभाविक प्यार और बालपन की मस्ती देखने में भी दूभर है।

पद चित्र: चेतना और हम

मृत्यु क्या है! 

यात्रा है.... चेतना की, 

पत्थरों से शुरू... होकर

आ रही है, यह... निरंतर।

खनिज.. बनती, पौध... चढ़ती

जानवर के तन... समाती

दूध या फिर मांस... बन बन

आदमी का अंश... पाती

जन्मती है बार... कितने

मृत्यु पाती... जन्म लेती

चेतना ही सतत आगे बढ़ रही है।

और क्या है मृत्यु बोलो

उन्नयन है, चेतना का कर्म से

अवनयन है चेतना का कर्म से

फिर उसी जड़ पत्थरों तक।

पद पंचम: सलवटें और जिंदगी

सलवटें है जिंदगी में... 

तभी तो यह... जिंदगी है

फिसल जाएगी नहीं तो 

बदन ऊपर हाथ रखते।

रोक थोड़ा, रहम तो कर

यार मेरे, रुक जरा..

एक सलवट पुरानी है

बहुत दिन की आज भी 

बासी पड़ी है, सलट ले.।

जय प्रकाश मिश्र


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