आज चढ़े दिन , देखा....

आज चढ़े दिन, देखा....

मैने... 

लोगों ने, 

नाफरमानी की जिद......कड़ ली है

जी हां! 

शीशम बाग में... 

मोटे, तो छोड़..  दुबले... ,  पतले...

एक हड्डी वाले, 

शीशम के पेड़ों ने.... परेशां होकर

अब तो. ...

उनकी इस कदर 

भेजी.... 

झुलसती... तपती.... गर्मी से 

उमठ उमठ कर... 

मरने से पहले एक बार...

हरे... हरे... नए.... परिधान... 

पहनने को... मिलकर.... 

तवज्जो ए तरजीह....  दी है।


यह सच है, 

नरम, कोमल बिलकुल मुलायम 

कोपलों... संग, पुराने... पत्ते

अमरख.. अमरख.. के, 

ऐंठ... सूख, गए, 

उसकी इतनी बेतहाशा... गर्मी से...

वे, 

मर... जाते, 

वो तो... शुक्र करो...

मानवता अभी जिंदा थी ! 

इतने पर भी..., 

कहीं..... लोगों में…।

तब कहीं, 

वो जिंदा बचे, जिंदा रहे..

उसी मानवता की, आपसी 

ठंडी शीतल हवाओं ने.... 

मिलजुल के....

बह बह... के बार बार...

बची खुची... ठंडक दे दे के, 

बचाया उन सबको..।


डर!.. 

डर... अब 

उनको नहीं, 

उसको ही लगता है...।

जब से सरे राह! कल देखा, 

मैने..उस, कमजोर, 

बे-पत्ते वाले, 

गुलमोहर ने भी...

आगे बढ़ के सबसे...आग... से, 

जी हां... आग के फुफकारते...

लाल... लाल... फूलों से... 

दिली.. दोस्ती की है।


इतना ही क्यों.. 

वो देख.....कैसे, हो के 

बेखौफ...

इतनों गर्मी में, सूखती लकड़ी होती 

अपनी डाली ऊपर 

उनको उसने... 

खिलने की 

बेपनाह... जगह दी है।


नाराज हैवो! बहुत...,   

सुना है..

खफ़ा भी है, वो बहुत ज्यादा…

होना ही था…

अब देख न... 

इन सूखी बीरान जगहों पे...

इन बेहयों... के बेकार पड़े, पेड़ों ने 

एक साथ 

कैसे मिल मिल कर... 

उसके खिलाफ! आज सुना! 

खिल खिल के...

फूलजनी की है।


आखिर!  

कोई! उनकी 

गर्मी से कब तक जले…

अरे! आज तो  देखा… मैने

सारे गरीब गुनबों ने मिलकर 

एकसाथ

खुलेआम बगावत... कर दी है।

जय प्रकाश मिश्र

भाव: समाज में सभी को मिल जुल कर रहना चाहिए। समस्याएं हल होनी चाहिए और मूलभूत समस्या का निराकरण समय से होना चाहिए। इनकी अनदेखी और ऊपर से कड़ाई लोगो में अविश्वास और नाफरमानी की स्थिति ला सकती है। व्यवस्था का दुष्परिणाम सबसे कमजोर व उपेक्षित लोगों पर सबसे पहले पड़ता है। और वे सब कुछ से हीन लोग मरने मारने पर उतर आते हैं। उनके पास जीवन के अलावा कुछ होता ही नहीं।

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