हरि, हरे, माधव.. हमारे..
सोपान प्रथम: विंदु माधव
बिंदु हैं, जब चमकते हैं,
हरि, हरे, माधव.. हमारे..
सक्षम कहां आंखे हमारी,
देख पाएं..
और आगे..विग्रहों के
शक्ति जाग्रत रूप.. हैं जो
दीप्ति हैं.. राधा हृदय की
परा भौतिक रूप हैं
इसलिए आ..
आ शरण में हम सभी मिल,
श्री प्रभू के बैठ जाएं।
निकट का आनंद पाएं। .1
सद, चिदा, आनंद पाएं।
सोपान: द्वितीय
रस सब..... अन्तर्रस.. भए,
देखि अधर.... रस... राजि।
दीठि सकुचि पुनि थिर भई ,
प्रकृति... बैठि.. पद.. लागि। .2
जुगल मेलि.. इक रंग भए,
विस्मित बुधि.. जड़ लागि।
सहज ज्ञान समुझत सकल,
जगत.... गयो..... भरमाई। .3
जय प्रकाश मिश्र
भाव: 1. परमपिता श्री कृष्ण का सूक्ष्म स्वरूप प्रकीर्णज्योति बिंदुरूप है उसमे लौकिक नेत्र से उनका विग्रह दर्शन नहीं होता है।श्रीराधा जी के हृदय में जो स्वरूप है वह बिन्दुमाधव ज्योतिरूप पराभौतिक, प्रदीप्त है वहां समर्पण के भाव से शरणागति ही श्रेयस्कर है।
2. इष्ट का दर्शन होने पर सारे रस अर्थात सांसारिक सुख उस परमानंद में फीके हो गए हैं। उनके रसमय लाल लाल अधर की सुंदरता को देखते ही बुद्धि सकुचा गई, आत्मवेद हो अपनी सुधि भूल दृष्टि स्थिर हो गई और निरसौंदर्य की देवी प्रकृति प्रभु के चरणों में जा चुप बैठ गई।
3. श्रीराधाकृष्ण जब मिल एक हो जाते हैं वह लयात्मक दर्शन बुद्धि को जड़ कर देता है उस काल में मात्र सहज ज्ञान व सहज बुद्धि ही साथ बचती है सारे तर्क और विज्ञान और संसार भी शून्य हो जाता है।
सोपान द्वितीय
रूप के परिवर्धनों में,
चेतना ही खुल रही है
बदलता यह विश्व है या
बदलते हो तुम
कहीं पर! आंतरिक!
यह ध्यान दो!
सोच कर मुझको बताओ..
क्या वही हैं भावनाएं,
प्राथमिकता...
आज भी...
लेकर चले थे, सालों पहले..
कुछ तो हटे हो रास्ते से..
तुम!
सही मुझको बताओ
ना छिपाओ! सच ना छिपाओ।
एक रास्ता है विश्व यह..
चेतना कुछ खुल सके.., आगे बढ़े..
जीवन में इसको जी सके,
विश्वास पक्का कर सकें।
नियम तो यह बस एक है
पूरे फलक में..
तुममें ही नहीं.. सारे जगत में।
कुछ हुआ है आंतरिक बदलाव
क्या!
प्रेम, करुणा, दया, ममता कुछ बढी है
यदि हुआ.. है वास्तविक!
तो…
और आगे.. बढ़ चलो।
अच्छा करो, अच्छे रहो, आगे बढ़ो।
जय प्रकाश मिश्र
भाव: जन्म जन्मांतर का लाभ एक है चेतना अपने को जाग्रत कर ले। यह मानो भावों के जागृत होने से ही संभव है। याद समय के साथ हममें प्रेम, करुणा, दया सेवा, सच्ची मैत्री की भावना बढ़ रही है तो हमारी दिशा ठीक है और आगे बढ़ें।
सोपान: तीन
उसने..
जीवन.. छू लिया,
जब छू दिया बहती नदी को
हाथ से,
होश में रह, चेतना के साथ पूरी
समझो कि जीवन जी लिया। 1.
और कितना
चाहिए संसर्ग उसको विश्व का,
भरमता.. बहता रहे.. वह युगों तक,
चाहते हो, तुम यही....बस!
बहती नदी ब्रह्मांड की थी आदि से
तनिक उसका समय ही था
समय को वह छू लिया ।
समझो कि जीवन जी लिया। .2
वह
सुख से था,
आसान था हर रास्ता
चढ़ता रहा वह जिंदगी की सीढियां
सब ठीक था, होता रहा हर काम उसका
और उसको चाहिए क्या?
मै पूछता हूं!
क्या जिंदगी वो जी लिया। .3
जय प्रकाश मिश्र
भाव: 1. महान लोगों का जीवन काल बहुत लंबा नहीं सार्थक होता है चाहे शंकराचार्य हों या विवेकानंद अन्य भी। पूरी चेतना में अंतर्दृष्टि की स्वच्छता रख कर सार्थक जीवन अपेक्षया a हवा है। 2. हम लोगों की मान्यता से जीवन लंबा और सुदीर्घ होना जरूरी है जबकि यह आवश्यक नहीं सत्य के साक्षात्कार के लिए और चेतना को स्वच्छ होने के लिए जन्म के बंधन हेतु हैं उनका जीवन काल नहीं। 3. कुछ लोगों के लिए जीवन की सांसारिक सुख सुविधाएं ही जीवन है उन्हें मिल भी सकता है पर बिना किसी वाजिब उद्देश्य के और अनुभूति की विशालता के जीवन व्यर्थ हो है।
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