जीवन क्या... है,

क्षणिकाएं.१

जीवन क्या... है, 

जलता.... दीपक

बुझ जाए तो शाम...

जब तक जलता, 

लड़ता..  रहता

करता उम्र तमाम।


बाती जलती स्नेह सिक्त हो 

प्राणों को ले साथ

अभिमन्यु सा युद्ध झेलता 

अंधेरों के हाथ।


दुश्मन इसके जाने कितने 

पल पल, बढते...

पवन झकोरे.. 

लव को कंपित करते रहते..

मन का योगी, तन का योगी 

दीपक.. मिर्भय जलता रहता।


अविकल, अविचल

निष्ठा निश्चल

ज्ञान रूप 

यह दीपक प्रतिपल

कर्तव्यों के पथ पर बढ़ता 

वीर अकेला, लड़ता रहता।

भाव, दीपक हमारी संस्कृति में सदजीवन और स्वस्थ जीवन का प्रतीक है। उसी की तरह निर्भय और उद्देश्यनिष्ठ अर्थात ज्ञान और प्रकाश को साथ रख कर आगे बढ़ें। परेशानियां आएंगी डगमग होगा पर आ-जीवन योगी की तरह अविचल रहें।

क्षणिकाएं. २

कपड़ा कोई हो! 

फटा, पुराना, नया!  

अच्छा, खराब! 

सबमें थोड़ी या ज्यादा, 

कुछ में जल्दी, कुछ में देर से..

सोखने... की आदत होती ही है

आखिर प्रकृति ने रेशे.. बनाए है 

भीतर, नरम, मुलायम, उरिल 

स्नेह कैसे छोड़ें, 

बिल्कुल सारे आदमी जैसे

वे भी भीगते ही हैं

अंदर या बाहर

बाज कैसे आएं, स्वभाव 

कभी कहीं जाता नहीं।

भाव: कोई भी सभ्यता, संस्कृति, धर्म या कारक मनुष्य का मूल स्वभाव नहीं बदल सकता। सभी में प्रेम, करुणा, स्नेह जरूर होगा वह कैसा भी हो कहीं भी हो।

क्षणिकाएं. ३

उसने कहा, वह कहां है

मैने कहा.. 

वह उस वहां है

जो "एन" के लिए है।

उस एन के लिए...जो 

नेचुरल नंबर हो! 

जिसके लिए सदा "एन प्लस वन" 

सत्य हो! 

तभी से वो सिर पकड़े बैठा है,

क्या प्लस-वन बिना वह सत्य नहीं।

क्षणिकाएं. ४

बड़े मेहनत और शौक से

आशियाने बना.. करते हैं

किसी चलते फिरते... की

नजर न लग जाय इन्हें...।


दुख... संगम है 

खुद... का खुद.. से

बैठ अकेले.... देखो...,

सुख छाया अरमानों की है

मित्रों.... के संग... बैठो..।.

पीड़ा परिवर्तन का दिन है

सच में.... रो कर... देखो।

चिंता चतुराई से आती

चतुराई कर देखो।

क्षणिकाएं.५

एक मोर... ने मोरनी से कहा...

जब लबे बरसात.... तूं... 

ढंग से... कुछ गाती है,

बदली ये नचती है

हवा भी मचल जाती हैं।

तब मोरनी.. ने मोर से कहा..

जब लबे बरसात.... तूं

खुद को भूल जाता है

'पर' फैला के नचता है

झूम.... जाता है, 

दरिया ये उफन जाती है 

समंदर खुश हो जाता है।

जय प्रकाश मिश्र


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