प्रश्न है... उस..अमूर्त का, वह कौन है..?

(स्वरचित गंभीर मूल रचना भाग एक)  

शीर्षक: सृष्टि विचार 

प्रश्न है... 

उस... अमूर्त का, 

वह कौन है..? 

जो भाग लेता है.. क्रिया में.. 

मूर्त बनकर विश्व में, इस सृष्टि में... 

इस धरा ऊपर।

क्या विश्व की छाया है.. वह? 

या,: इसकी परिधि से... दूर है! 

प्रश्न है..वह कौन है? 


मानव ये, . क्या है? 

क्या रूप भर. है?  

आकृति है... चेतना है, मात्र! बस.. 

जो, सुख संजोए... जिंदगी भर, 

समय काटे... चैन से.. 

संपूर्ण अपना..., 

जिस भी तरह, निश्चिंत होकर! 

बस!  यही बस! 


या लड़ मरे, एक दूसरे से 

छीनने में वस्तुएं, समृद्धि सब, 

आगे निकल कर और सब से, पार्श्व के.. 

गर्व से फूला रहे! 

बस! यही बस।

पर, प्रश्न है.. यह कौन है, और क्या करे ? 


क्या घर बनाए, बहुत सुंदर, 

उसको बसाए..

राग.. पाले संबंधियों में, 

पत्नियों में, 

बच्चे पढ़ाए, जिम्मेदारी निभाए 

आरुग्ण होकर! एक दिन 

वह चल बसे, बस! 

यहीं पर सब छोड़कर! 

प्रश्न है.. यह कौन है, और क्या करे? 


क्या करे वह! पूर्ण होकर, जिंदगी में...

अधिकार पाए, जंगलों पर, भूमिपर, 

बुनियाद पर सारे सुखों, आनंद पर

उस तृप्ति को वह कहां खोजे.. 

इस धरा पर,

तृप्त हो कर रह सके, वह, कुछ दिनों तक।

क्या प्रश्न यह अप्रश्नेय है! 

यह कौन है, और क्या करे ? 


त्याग दे सबकुछ यहां का... 

धूनी रमाए जंगलों में..

क्या करे वह!  सोचता हूं।

गांधी बन देश की सेवा.. करे, 

दीन दुखियों में मिले..

छोड़ अपने बाल बच्चे, और जीवन 

जा मिले..

किसी मिशनरी.. से, 

या शुरू में ही नन बने, वहीं जीए अरु मरे।

वह क्या करे!  


कुछ निश्चित करो, सब बात करके।

श्रेष्ठ क्या है! क्योंकि..

प्रश्न है.. वह कौन.. है, और क्या.. करे।


विश्व ये बनता ही क्यों है! 

राज क्या है! 

इन शरीरों में छुपा, वह काज क्या है? 

आवर्तनों के गर्भ में, 

समय के इस चक्र में

वह भेद क्या है! 

खींचकर ले जा रहा जो विश्व को 

इतने दिनों से, वह राज क्या है? 


इन चर विचरते 

रूप भीतर क्या छुपा है? 

यह तो पता है.. आज हमको.. 

सृष्टि सारी किसलिए है, 

यह..संवरती.. सजती..निरंतर 

प्रा..णी जगत जिंदा.. रहे।

शक्ति उनको दे सके.. 

बलिदान देकर स्वयं का

मूक शायद इसलिए है 

दुख न हो, इन्हें और का।


आयु खंडित इसलिए है.. 

खंड से निर्मित है ये,

युग्मता.. जीवन बनाती.. 

जाने न क्या संयुग्म कर! 

पर युग्मता की आयु है, 

वह बंध है उन तत्व में 

जीवन बना जिन तत्व से..।

बंध शाश्वत हैं नहीं, 

इन्हीं की तो आयु है..

हर बंध मतलब से बना है, 

समय की दरकार है, 

प्रेम हैं, बंधन ये सारे

तत्व जिनसे जुड़ रहा है।

अब तुम बताओ 

वह कौन है क्या कर रहा।

इस धरा पर, यह ..प्रश्न है..

 

अनश्वरता से लड़ाई 

हाय किसकी चल रही है।

तूं अनश्वर एक है, मैं खंड हूं!  

फिर भी खड़ा हूं 

सामने तेरे यहां, देख तूं सच देख तूं।

आगे क्रमशः पढ़ें ..

जय प्रकाश मिश्र










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