मन के अंगना.. जरै दिन राती..

पहली पंखुरी है यह.. लें, इसको पढ़ें: 

 (स्वरचित मूल रचना)

मन के अंगना जरै दिनराती..

बाती.. रे सजना।

मूक.. बधिर.. बन, संग संग घुंमू.. 

जर.. अजरा... कहलाऊं..

चिर प्रसन्न,.. तुम संग, 

अंग... लग लग.. 

निर्भय, मधुमय.. गाऊं... 

कवन विधा.. एक आंगन... खेलूं

तुम संग रे संजना...।

मन के अंगना.. जरै दिन राती...

बाती..., रे सजना..।

आन मिलो.. अब, आपुहि... ही तुम, 

मैं हारी रे!  सजना।

आन.. गती, मोर, तुम्हहि संभारो

तुम अवतारी रे सजना।

मन के अंगना.. जरै दिन राती...

बाती..., रे सजना..।

जय प्रकाश मिश्र

भाव:  निसर्ग प्रेम नितांत एकांत और प्रचुर प्रशांति खोजता है। गहन मिलन, एकात्मकता की प्यास लिए होता है। वह बाह्य नहीं आंतरिक आत्मा की प्यास भी होता है। यह काल और आयु बाधित कभी कहीं नहीं होता, सभी भाषाएं और शब्द वहां मौन में स्वतः समा जाते हैं। आत्मलय हो, एकत्व उसकी पहचान है द्वैत को स्थान ही नहीं है वह निरपेक्ष प्रेम है प्रसन्नता झरती है पुष्पों के सौरभ सी इससे, किसी प्रकार का भय और संशय वहां नहीं। विलग, अलग होने की सभी संभावनाओं की समाप्ति है। यहां एक ही अनुभूति दोनों पक्षों की होती है यह प्रेम है सच्चा प्रेम है।

अंतिम पंखुरी है यह, अब इसको पढ़ें:

(स्वरचित मूल रचना) 
क्या है यह! 
और क्या है वह! 
कौन है यह! कौन है वह! 
इस धरा पर... 
ढुलकते…
दो…
आम ...से 
सामान्य पत्थर…।
और क्या..हैं 
तूं और... मैं? 

समय की बहती, 
नदी की धार ने, जिनको यहां, 
है, ला दिया..
कुछ.. 
देर... को बस.., 
और क्या है साथ, 
यह सब! तुम ही बताओ? 

रो.. रहे हो, 
हंस... रहे हो,
कैसे प्रफ्फुलित.... हो रहे हो..
पकड़ इसको, चूमते..हो
जाने न कब से थक.. रहे हो..।
है नहीं मालूम, कल 
जिसका, तुम्हें 
जिंदगी की डोर उससे बंध रहे हो..।

टूटे हुए, पहले थे सारे
इक दूसरे से, 
दूर थे, 
जो 
खुद में ही संपूर्ण थे
दुनियां अलग थी, 
रास्ते 
दो फाड़ थे..
जिनके दिलों के
रंग उन में डाल गहरा, 
चटख इतना..
मणि, मोतियों, मूंगों को संग संग 
सिल रहे हो।

सोचो... तो कुछ! 
मणि, मोतियों, मूंगों की 
अपनी आदतें और उम्र हैं,
वे बहुत ज्यादा, चिक्कनी अरु ठोस हैं 
सट नहीं सकते कभी
एक दूसरे से
धागे तुम्हारे तंतु हैं, रंध्र हैं उनमें अनेकों
अलग हैं, 
एक दूसरे से..

उम्र उनकी बहुत कम है, 
बंध यह स्थिर नहीं है,
एक दिन ढह जाएगा
सब्र तेरा 
सच कहूं, उसी दिन 
ढल जाएगा यह सद्र तेरा।

जय प्रकाश मिश्र
भाव: इस संसार में हम अपने को लोगो के साथ अन्यान्य संबंधों से और कुछ लोगों को अपनी आत्मीयता से, राग से चिपका लेते हैं जबकि नियति के लिए और सम्यक बोध वाले व्यक्ति के लिए और वास्तव में भी यह नेचर की बहुत सामान्य सी चीज है। जैसे किसी कार या मशीन में अनेक नट बोल्ट एक साथ मिल कर अपनी जगह अपना काम करते हैं। अतः रागात्मक संबंधों से दूर ही रहना चाहिए।

नीचे झड़ी, सूखी हुई, एक पंखुरी है यह:  

 सर इसको पढ़ें: (मूल रचना स्वरचित) 

सांद्र रस रिसता था उससे, 
तंतु उर के भीगते थे,
मन उड़ाता था परों को, 
पग नहीं पर डोलते थे।

उस फटी, बेसुध पड़ी,
खेली गई, नोंची गई..
रंगीन कपड़ों में बंधी..
गंदी किसी की पोटली 
सी..
क्या बंधा था बीच उसके
सत्व था, 
जीवन किसी का
जग देखकर हैरान था! 
ये क्या हुआ,कैसे हुआ? 

जय प्रकाश मिश्र

भाव:आज के लाइफ स्टाइल और भौतिकतावादी  सभ्यता में नारी की जो कथाएं और दुर्दशा आए दिन सुनने को आतीं हैं बड़ी दर्दनाक होती हैं। उसी का एक चित्रण किया गया है। एक सताई गई और दुर्व्यवहृत लड़की की क्या हालत हो जाती है कभी कभी उसे और उसके हालात देख कर लगता ही नहीं कि वह मानव शरीर होगा वह वस्तु हो जाती है। मनुष्यता पन्किल हो अपने वीभत्स रूप ले कर सामाने आ खड़ी हो जाती है।
 

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