सच कहूं..! वो कौन था!

छोटी कविता:  दुनियां ये.. क्या है! 


रंगे हुए ये लोग सारे

जो, फुलझड़ी बन घूमते है,

क्या कहूं, बस वक्त की ही आड है...

तुम हटा कर देख लो.. 

नंगे हैं सारे....

आज का सच कह रहा हूं,;

शेष तुम... 

सब... जानते हो! 

पायदान दो: सफर नामा मेरा

सच कहूं..!  तो.. लो...! 

बात सच्ची.. कह रहा हूं ... 

मैं तो ....

पेशे से इंजीनियर था..

सिविल का...

सरिया.., गिट्टी..., मिट्टी.., 

और..? 

और..क्या! 

गरमा गरम लिट्टी।


चौंक.. गए! अभी से..

अभी तो.. 

शुरू भी नहीं.. हुई! 

यह लिट्टी क्यों? यही न! 

भाई साहब! कार्यस्थल, साइट्स थीं, 

दूर थीं…बस्ती से, लोगों से

पेड़ों से…, पानी से…, 

अच्छे दाना पानी से.. 

और...! 

और क्या?  चढ़ती.....जवानी से। 

फिर चौंके! 

शुरू तो करने दो.., भाई, 

आगे तो बढ़ने दो..भाई।


अच्छा सुनो,

तो क्या मिलता वहां,

अहरा की दाल, उड़ती माटी..

प्रायः चोखा और गरमा गरम बाटी।

इसके सिवाय, 

क्या मिलता..., तब...वहां ! 

नहीं बना था, यहां, 

ये जो देखते है आज बना..

चमचम करता ये लुलु मॉल, 

पास में ये, उठते गिरते कर्व,  

संग करवेचर लिए लोग और 

शानदार क्लब, 

यारों! तब.. , 

ये  तो बाबू, बना है सब,अब..।


फिर चौंक गए, 

न आप! .. 

क्या कहे हैं! ये क्या कहे हैं..? 

ये, अभी अभी! बड़े धीमे से!   

जानता हूं आप अभी.. 

सदमे में हैं! 

उस "चढ़ती जवानी" के छह गो 

अक्ष-र पर, 

वहीं अटके हैं..।


पर वाकया यही था,

मैं बिल्कुल सही था।

सारे वर्कर…

श्रम की न्यूनतम आयु से ऊपर थे..

साइट के बाहर टंगे..बड़े से

बोर्ड, पर लिखे...उम्र की सीमा से, 

कुछ ज्यादा ही ऊपर थे।

छापे पड़ते थे तब, 

चेकिंग होती थी... गजब! 

नौजवानों को भी उम्र ज्यादा बताने की 

हर रोज ट्रेनिंग होती थी तब।


पर, रस! 

रस, कम नहीं था

पसीने का हो, या आंसू का, 

ग़म कितने हो, यह

कभी.. कम नहीं था।

देखता था.. हालात, 

सुनता था बात.., 

परेशानी का सबब.. 

श्रमिकों में ही नहीं

चौकीदार, मुंशी, सुपरवाइजर, 

कार्मिकों में भी बहुत था।

फिर भी 

मधुमयी शाम होते होते… 

फिर.. 

किसी को.. कोई ग़म… 

नहीं था।

आप तो 

जरूरत से ज्यादा 

समझदार निकले, 

मेरी बात.. पूरी हो 

उसके पहले... ही, मतलब निकाल बैठे।

पर रोज रोज, ऐसा नहीं था! 

बाहर रिमझिम, फुहारें पड़ें...

और.. तंबू में, चावल-चिकन भी पके... 

फिर देर तक... 

साहब लोगों की... दावत भी उड़े।


कभी कभी! 

क्या होती है जिंदगी..

होती थी, सच्ची! मुलाकात!

बिना पर-पंखों की, बिल्कुल नंगी,  

बदहवाश, 

करती विप्लवी विलाप...

जब कोई गिर जाता, दूर ऊंचाई से..

कराहता., रोता बिलखता ..

या मर जाता...

जब आकर खड़ी हो जाती 

एक ऐसी जमात! 

नन्हे,मुन्नों की, अपाहिज

अनपढ़, गंवार आश्रित बीबी बच्चों की। 

वो, रो देते! 

रोते रहते!  सामने सबके!  

कर, कर अनसुनी चीत्कार! 

और मैं… 

मैं रोता भीतर, बह जाता, 

मीलों, उनके साथ,, 

देखता! आने वाले दुष्कर…! 

कुटिल और कठिन परिस्थितियों 

के हाथ! 


कोसता इतनी 

बड़ी व्यवस्था.. को

जो है इतनी बड़ी! कागजों पर लिखी..

मात्र देखने को...

अदर से बिल्कुल लाचार! खाली शुष्क बेकार! 

सोचता! 

इस परिवार की लाठी का भार 

अब आगे कौन उठाएगा! 

तभी एक टैंपो आता, धुआं फेंकता, पुराना 

शोर करता, सबको भरता

कुछ रुपयों के साथ 

सबको गांव, पहुंचा आता।

पर गांव का इंतजाम!  

भर, भर थैली, लेकर जाता।

पैसों से भविष्य तौला जा सकता है

सोचता! और मनमुख होता, 

थकित तन विगलित लिए मन

घर को जाता।


सोचा था 

दुनियां बदलूंगा

कुछ अच्छा, बाद में करूंगा, 

मातहत था! जब, मैं अपना कुछ करूंगा।

किया भी, पर सच कहूं 

स्थान जादू है 

ऊंचे से, नीचे.., 

धुंधला दिखना ही, आज भी चालू है।

क्या कहूं! किसे दोष दूं? 

जय प्रकाश मिश्र (स्वरचित मूल रचना) 

नोट: क्या चाहेंगे इसे आगे लिखा जाए बढ़ाया जाए या यहीं खत्म कर दें सुझाव दें।




 

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