अधर बन, अधखिल-खिली थी।
इक कली थी,
कुमुदिनी… की
झील के…. दर्पण सरीखे
स्वच्छ, मुख पर…..
अधर बन,
अधखिल-खिली थी।
लावण्य-मयि, सुषमा लिए,
सुनसान में,
विस्तीर्ण, लहलह लहकते
जलराशि के संभार पर,
कुछ अनोखा सोचती,
मदिर मन! वह, मंद ही
मुसका रही थी।
हिल रही थी,
मधुर लय में बह रही थी
पुरवाइयों के अंक में..
कुछ कंपकंपाती, इस तरह
डगमगाती...
साल भर की बालिका सी
चल रही थी।
गर्दन सुराही से भी लंबी,
कुछ ज्यादा
झुकी थी..
नाल पतली, पारदर्शी
के सिरे पर
खोलती निज वृन्त
वह नव्या कली थी,
पर, अभी नलिनी नहीं थी।
भाव: प्रेम ही वह अकेली एक मात्र, स्वतः स्फूर्त उत्तरोत्तर बढ़ती हुई शक्ति रूप है जो हर वस्तु में, प्राणी में या हर चीज में गतिमयता उत्पन्न कर देती है। इतना ही नहीं किसी गतिमय वस्तु के मार्ग को अपनी उपस्थिति मात्र से बदल सकती है। प्रेम क्या है एक प्राकृतिक खिंचाव की शक्ति है। एक से दूसरे के प्रति जिसे दोनो बराबर ही महसूस करते हैं। कोई भी दो हों जीवंत या द्रव्यमान मात्र उनके बीच यह शक्ति अदृश्य रूप से कार्य करती है। विश्व का सारा प्रेम या खिंचाव सूर्य की ओर ही होता है उस अंतिम एक की ओर। प्रेम का रूप सौंदर्य में छुपा होता है। कुमुदिनी उसी का प्रतिरूप है।
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