एक घूंघट है,चलो इसको हटा दें पहले।

प्रस्तावना: न जाने कितने सदियों से अपना समाज बंटा बंटा रह रहा है। कुछ तो समझ की कमी हर कुनबे में है कि चीजे साफ नहीं की गईं।  इन्हीं से अविश्वास और दूरियां पनपती रहीं। इन वजहों से परेशान सभी बराबर एक समान ही, होते रहे हैं। अतः सही ढंग से आगे मुल्क बढ़े और जड़ से गरीबी, समस्याएं दूर हो इसके लिए सबको इकट्ठा होना पड़ेगा। मतभेद, जाति, धर्म की तुलना में देश को वरीयता देना ही होगा। जब सभी एक मत, एक हित, एक देश के लिए काम मिलकर करेंगे तो सागर सा उफान और ताकत आएगी देश विकसित होगा। किसी की कोई बात अगर सही है तो समुचित वार्ता कर मुक्त कंठ से मानी जानी चाहिए और गुत्थियां सुलझनी ही चाहिए। आखिर कब तक, हम भारत के लोग ऐसे ही रहेंगे। इसी भाव को लेकर आगे पढ़ें। 

पहली कविता:  आओ मिलें

एक घूंघट है, अना पर 

यारों… 

चलो, इसको हि.., हटा दें 

पहले..।


जाने न! 

कितने दिनों से, 

तुम हम, साथ रहे.., 

एक ही, मकसद लेकर..

जिंदगी....आसाँ हो, 

प्यार.. भीतर पनपे!  

पर.. देख न! 

इस घूंघट.. ने! हमें.. 

तिस.. पर भी, 

कितने.. हिस्सों में, बांटा.. कैसे।

आज भी हम, 

वहीं खड़े हैं, वैसे के वैसे।


आओ मिलते हैं, 

चलो..

इस बार.. 

बे-पर्दा ..हम-तुम

ताकि… अबकी, 

किसी भी.. शिकवे को,

कोई.. भी, 

शिकायत न… रहे।


कोई बात.. 

अगर भारी.. है, 

सच.. लगती है तुम्हें,

तो पूरी बात..तसल्ली से करो!  

पलड़ों पे.. रक्खो उसको..

तौलो एक बार 

तराजू.... संग मेरे..

तुल जाय अगर... इसपे, 

कुछ भी... बढ़के..

तो उसे.. तुम, 

जरूर, जारी… रक्खो।


आओ.. 

एक साथ चलें, काम.. करें..,

आगे बढ़ें, देखें तो.., 

वो सा..रे सबब.., 

तन्हां, तन्हां होकर..।

जो मिल जांय.. एक साथ 

सभी के अगर, 

तो यहीं, प्यारा.. लहराता 

हसीन..

समंदर लहरे।


जानते हो! 

सागर…, 

सागर.. होता है! 

सब-अंदर, नहीं समंदर होता है।

शक्ति.. होता है! 

लहरों से दूर दूर तक घिरा,  

ताकतवर,

बहुत विशाल और विस्तृत..

होता है।


मचल जाए, अगर, 

थोड़ा भी, 

ये समंदर, सागर अपना...

तो बड़े बड़े.. शहरों को 

एक साथ.., निगल लेता है।


फिर तो 

मुक्ति.. मोतियों सी..

किनारों पे बिखर… जाएगी

बीन लेना.. 

अपनी मुट्ठी… भर

निडर होकर.. 

चाहे जितनी..

उसमे समा.... पाएगी।


दर्द सहना.., दया ढोना.., 

मेहरबानियों... 

के तले दबते...रहना..., 

जिंदगी ऐसे ही झुक झुक के 

जीते रहना….

क्या है?  

छोड़ इसे, इंसा है तूं भी..

खुश होना, सर उठा के चलना..

नाचना, गाना, 

बेफिक्र होकर जीना..

हक सबका है, सबको मिले

कुछ कर ऐसा, 

अब तो यहीं, अपनी जमीं।

पर इसके लिए. .....

एक घूंघट है, अना पर यारों… 

चलो, 

इसको ही.., हटाते हैं पहले..।

जय प्रकाश मिश्र

द्वितीय कविता:  एहसास है 

एहसास है मुझे, 

मुझे ही क्यों, लोगों को भी..

जो जज्बात समझते हैं…

सबके..

कुछ धुंआ है…घुल गया है, 

फ़जाओं.. में..

पर साथ हैं.. सभी, 

मिलकर.. झेल लेंगे..

जरूर! पक्का वादा है,

हारेंगे नहीं....।

मिला तो लेंगे ही 

अपने में, 

रंग उसका हल्का कर देंगे,

नहीं... नहीं...

तरकश और तीरों से नहीं…

जुड़ी और जड़ी 

मुस्कुराहटों के बल पर..

अपनेपन की तुरपाई और 

समझ से सिलकर।


तल्खियां…मिटने के लिए, 

शिखर एक दिन…. 

.........झुकने के लिए, 

दीवारें कभी तो… 

..........गिरने के लिए,

कुछ लोग होंते हैं, 

..........बना जाते हैं।

एहसास की पाकीज-दगी में 

फूल-खिलें,

गुलिस्तां महके, 

सब संग संग झूम उठें, 

एक साथ एक दूसरों के 

दिल भी जुड़े।

चलो सब मिलजुल 

एकसाथ चलें, 

दिल चाहता है, इस मुल्क में 

चहकतीं चिड़ियां चहकें

निर्द्वंद उड़ें,

निर्दुन्द उड़ आकाशों में दिखें।

जय प्रकाश मिश्र

स्वरचित मूल रचना

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