अपना घर बहती दरिया पे बना रखा है।
प्रथम: मशहूर शख्सियत और पहुंचे हुए लोग
(स्वरचित मूल रचना)
लाखों… की इबारत.. पे,
कैसे, ये, जमा.. बैठा है…
ख्वाइश! एक नहीं, संग, ये भी,
ऐलान… किया करता है। 1.
कोई… पूछे तो इस्से…!
ये दुनिया-ए-ज़मा…
होती क्या… है?
तूं खुद ही देख! पूरा घर…इसने, अपना,
कैसे कसे, भरे, बिस्तरबंदों से सजा रखा है। 2.
इसकी ये...
दुनिया-ए-फानी…,
बातें… सारी, केवल कोरी..
मात्र, जुमला-ए-जबानी। 3.
सुन सुन के अजीबो-गरीब
इसकी, तार-ई-ए-कहानी
क्या क्या कहूं मैं तुमसे!
मैने तो, अपना घर, अब ही से
इस बहती... नदिया पे बसा... रखा है। 4.
बहते घर में!
ख्वाइशों का ठिकाना कैसा?
जो बाग़ किनारों पे दिख जांय,
बाग़बाँ वैसा। 5.
जय प्रकाश मिश्र
द्वितीय; नास्तिक की स्थिति (स्वरचित मूल रचना)
एक ओट... लेकर
खड़ा हूं मैं, जानते हो तुम!
हिल नहीं सकता है वो...
अडिग.. है जो सर्वदा.. से
सनातन... है
लीक अपनी ही टिका... है
ये जानते हो... तुम।
तुम नहीं मानोगे उसको
जानता हूं मैं,
फिर भी,
यदि तुम कोई...
विधर्मी होते तो भी
पूरा... विश्वास कर लेता..
तुम पर..
आखिर तुम्हारा एक..
खुदा, ईशा, ईश्वर कोई तो होता!
तुम तो और नीचे गिर गए हो !
क्योंकि तुम!
मानवों में प्रचलित
हर धर्म से भी
हीन हो गए हो।
आखिर! तुम्हारी जिम्मेदारी
क्या अपने और
अपनो तक ही सीमित है।
सच कहूं! सुनो!
तुम इस सृष्टि में,
यहां,
इस हाल में जिंदा हो...
एक शरीर बन घूमते हो
ये उस ताकत.. का ही सुबूत.. है।
तुम्हारा बनाया, यहां क्या था?
और क्या बचेगा?
जय प्रकाश मिश्र
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