क्यों फैलती है बेल.. क्यों यह विश्व बनता..
पुष्प प्रथम: नारियां और हम
हर पुष्प!
मन, सौंदर्य… का है
रंग, उसका हृदय है
पंखुरी, तन बन, झलकती
समर्पण, मकरंद है।
है, झुका!
तेरे सामने वो…
देख तो एक बार… उसको!
डाल पर है.. झूमता..
बोल, सकता…है. नहीं।
नेह आमंत्रण लिए…
चुप… चुप खड़ा है, जोहता…
बाट तेरी देखता है
रात भर... है महकता!
वह, एक क्षण सोता.. नहीं,
देखता.. अपलक.. तुझे;
ध्यान तेरा खींचता।
कुछ बोलता तक, वो, नहीं है
क्योंकि...,
मौन, उसका धर्म है
सौंदर्य उसका रास्ता..है।
देख तो.. एक बार उसको.. प्रेम से....
मीठी कुहुक.. अमरित भरा..
उसका हृदय.., अनमोल है।
भाव: हमारे समाज में नारियां, आज भी अनेक मायनों में चुप चुप ही रहती हैं। अपनी सार्थकता के साथ अपने जीवन को लेकर परिवार में और अपने प्रिय को प्रस्तुत भी रहती हैं। दिनरात परिश्रम और निष्ठा की आहुति भी देती हैं। ईश्वर ने उन्हें सौंदर्य का उपहार, मीठी बोली का उपहार सौंपा है वे सदा आदरणीया ही हैं।
पुष्प द्वितीय: मुख्य कविता: यह विश्व क्या है
(स्वरचित मूल रचना)
क्यों फैलती है बेल..यह!
क्यों यह विश्व बनता..
सोचता हूं,
है कहीं कुछ द्वंद..
जो है करकता,
क्षण क्षण, अनु-क्षण जगाकर,
हर चेतना को बांधता,
दूर कर संताप की लौ..,
लौ... लगाता,
खींचता, सिर उठाता..
उर में पिघलकर..,
उर ही.. मिलाता, साथ सबके..
क्रांति का है बीज, बोता।
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
भाव: संसार क्रमिक आगे बढ़ रहा है। इसके पीछे कौन से कारण होंगे? बेल या लता एक उदाहरण है जो सदा तेजी से आगे बढ़ती है इस नित्य नवीन होते संसार को निरूपित करने का। मेरा मानना है, कि हर समाज में और मनुष्यों में भी एक आंतरिक द्वंद हमेशा उपस्थित होता है जो उस समय की यथार्थ स्थितियों से बना होता है। यही द्वंद विचारों में अप्रसन्नता, आंतरिक उद्वेलन, कर्मों के प्रति प्रायश्चित, और आंतरिक शक्ति को जगाने का कारण होता है। भौतिक जीवन में असमानता, अन्याय, समाज में व्याप्त विद्रूपता जीवन की असहजता कुछ तो होता है जो जीवन को द्वंद के साथ आगे चलाता है। मुक्ति के लिए उठता है, जागता है आगे बढ़ता है और अंत में क्रांति तक भी पहुंचता है।
कहीं कुछ है,..
जो चल रहा है…।
गर्भ में.., तन में.., या. मन में..
विकल है वह.. निकलने में।
रास्तों की खोज में,
निकले कहां से.. खोजता, हेरता
दिनरात गुम है, वह हमीं में।
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
यह संघर्ष बाहर नहीं दिखता, मन में, विचारों में, बातचीत में, जीवित रहता है। अपना रास्ता, समान सोचवालों की खोज हमेशा तलाशता, रहता है।
क्या.. खोजती? और सोचती..
धुंध.. में एक..
यह बेल छोटी.., नर्म-ओ-मुलायम,
तंतु सी..,
संवेदना-के-रोमकण, उर-अग्र पर
पहने हुए...
सहज, तरला.. रूप ले, कांटो लिपटती
आधार... को है, तलाशती।
चहुंओर हिल डुल, दुलकती
कण एक बढ़ती, निडर हो
संघर्ष के, संग्राम की,
उस पारमिति तक!
पींगे है भरती, निडर चलती।
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
भाव: मानवीय अन्याय और अत्याचार के प्रति खीझ और इससे मुक्ति के लिए सामान्य जन से समर्थन की प्यास अपनी अस्मिता के साथ साथ इसी पथ के लोगों की तलाश में लगी रहती है। और यथार्थ की भूमि को अनुमानती निडर हो अपनी रूप रेखा तैयार करती रहती है। क्रांति के लिए उसके ज्वलन बिंदु तक अपने को तैयार रखती है।
यदि.. आगे बढ़.. रही है.. बेल!
तो विश्वास होगा हृदय में…
कहीं तो, इस नियति के प्रति,
जो प्रबल है..सबल है
शाश्वत सबल है..
या शून्य होगा…एक!
निश्चित भाग है, जो! हर किसी का!
या कर्म ही, अब, शेष होगा..
वो ही जाने!
पर हवाओं संग
रुनझुन, घुंघरू बजाती
कुछ कर रही है बेल।
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
भाव: भौतिक परिस्थितियां और समस्या की प्रकृति मिलकर एक ताना-बाना बुनती रहतीं हैं। अब उसे कुछ ईश्वर की मर्जी और कुछ व्यवस्था का सिंक्रोनाइज्ड स्वरूप पर समाधान की प्रक्रिया स्वतःस्फूर्त आगे लोगो के बीच चलती रहती है।
क्या है कहीं, संवाद कोई!
पत्तियों से डंठलों में, शांत हैं सब,
देखने में, पर कहीं कुछ चल रहा है…?
कली कोई वो निकालें
किस समय, किन अंतरों में,
कौन जाने..
रंग को या रूप को
कौन निर्धारित करेगा?
कौन जाने?
सब, सहमति क्या बन गई है!
इसलिए, इस रात के पिछले पहर में
कली चुप चुप खिल गई है।
कौन है क्रम से, सभी कुछ कर रहा है।
वह बात किससे, और कैसे कर रहा है
पुष्प में सौंदर्य,
सुषमा, और सौरभ भर रहा है।
नेपथ्य में वह बैठकर
सोचता सब कुछ! समय पर कर रहा है।
भावना का खेल है सब
या कही कुछ चल रहा है।
सोचता हूं, पूछता हूं!
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
भाव: सारी.. कविता पढ़ें खुद समझें भाव सबसे नीचे पढ़ें, ब्रेक हो जाता है माफ करें।
कौन है?
हर जगह बैठा!
हर चीज में, इस प्रकृति में..
हर समय में..
सब कुछ व्यवस्था से
यहां पर हो रहा.. है।
वह कौन.. है?
जो जी... रहा है!
लालसा में मर.. रहा है,
सदा आगे... बढ़ रहा.. है,
प्रगति का पथ... चढ़ रहा है।
पूर्ण करता... पूर्ण जीवन...,
जीव में, हर प्राणियों... में,
पत्तियों में,
मृदा में, हर चीज में
जो जन्म ले ले... मर रहा.. है।
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
जो जिंदगी!
तूं...जी रहा.. है,
वो जिंदगी.. सब जी.. रहे हैं,
प्राणी पत्ते..,
पर्वतों के ढेर यह..,
सकल सृष्टि..
देख तो..
जन्म ले ले.. मर रहे हैं..।
तूं अलग.. है
इन सभी से.. सोचता है,
इसी से
तूं कष्ट सारे भोगता है।
वह एक है !
बस एक है! तूं समझ..
इसको...
मान मेरी,
समझ थोड़ी बड़ी कर..
और देख.. उसको.. पास अपने..।
एक चेतना.. है,
जागृति.. है
सदा रहती है.. यहीं पर,
रूप सारे.. बदलते है,
रंग सारे.. बदलते है
लोग सारे.. बदलते है।
वो कौन है?
जो प्रगति बनता!
निकल आता पुष्प से है
इन पत्तियों में खिलखिलाता
क्यों सुरभि भर अंचलों में
है लुटाता तेरे ऊपर
सोच तो वो कौन है
क्या यहीं जग चल रहा है!
क्या यही जग चल रहा है?
कुछ कमी है?
गतिमान हूं मैं.. चल रहा हूं!
प्यास है बाकी, अभी
क्या बुझेगी संग उसके..
पास आकर देख तो।
आ-बद्ध-नाभी-नाल से
तुम अकेले ... ही नहीं हो!
सौर मंडल साथ है यह
साथ हैं परमाणु सारे...,
नियम सारे साथ.. हैं,
यह नियति तेरे साथ है।
कौन है! वह नियंता
है कहां बैठा हुआ
पर कह रहा मैं सच
वह तुम्हारे पास है।
(स्वरचित मूल रचना)
Comments
Post a Comment